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महाभियोग या सत्ता से ‘वियोग’ – कुमार सुबोध

ज्वलंत

महाभियोग या सत्ता से ‘वियोग’ – कुमार सुबोध

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कपिल सिब्बल के नेतृत्व में प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस और कुछ अन्य दलों के गिने-चुने सांसदों द्वारा देश के प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा के विरुद्ध महाभियोग लाने के प्रयास को देश के उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने विफल कर दिया है और कहा है कि महाभियोग का यह प्रयास गैर संवैधानिक है। महाभियोग को जिस तरह उपराष्ट्रपति ने खारिज कर दिया उसे लेकर कांग्रेस समर्थित नेताओं, वकीलों के बयान आ रहे हैं। कानून के जानकारों ने भी अपनी दलीलें दी है लेकिन इन सब से पहले यह जानना आवश्यक है कि महाभियोग लाने के पीछे नीयत और नीति क्या थी? क्योंकि इस महाभियोग की अगुआई जो कपिल सिब्बल कर रहे थे वह कभी महाभियोग के घोर विरोधी हुआ करते थे और उन्होंने किसी जमाने में महाभियोग के विरुद्ध अभियान भी चलाया था।
फिर अचानक ऐसा क्या हो गया कि कपिल सिब्बल के मानस में इतना परिवर्तन आ गया कि वह अचानक महाभियोग के समर्थक बन बैठे। बल्कि लगभग 70 सांसदों और पूर्व सांसदों को हस्ताक्षर के लिए राजी कर उपराष्ट्रपति के समक्ष महाभियोग का प्रस्ताव भी ले आए। यह बात अलग है कि उस प्रस्ताव को पूर्व प्रधानमंत्राी मनमोहन सिंह और काँग्रेस के वकील तथा नेता सलमान खुर्शीद का समर्थन प्राप्त नहीं था। समूचा विपक्ष भी इस महाभियोग को लेकर एकजुट नहीं था। ममता बनर्जी ने तो फोन करके सोनिया गांधी और राहुल गांधी को महाभियोग से परहेज करने की सलाह दी थी। आम आदमी पार्टी सहित अनेक राजनीतिक दलों ने भी महाभियोग के प्रयास को बचकाना और फालतू बताया था। लेकिन कपिल सिब्बल महाभियोग को एक राजनीतिक हथियार की तरह उपयोग करना चाहते थे। सिब्बल यह जानते थे कि सदन में 44 की संख्या तक सिमट चुकी कांग्रेस और समूचे विपक्ष में महाभियोग लाने और प्रस्ताव पारित कराने की सामथ्र्य नहीं है वे यह भी जानते थे कि समूचा विपक्ष एकजुट होकर इस प्रस्ताव का समर्थन नहीं करेगा।
लेकिन फिर भी कपिल सिब्बल ने महाभियोग का प्रस्ताव न्यायपालिका पर और खासकर प्रधान न्यायाधीश पर दबाव बनाने के लिए प्रस्तुत किया। एक तरह से उन्हें आगाह किया गया कि वे खुलकर और निष्पक्षतापूर्वक फैसले ना किया करें और ना ही अपने तरीके से काम करने का प्रयास करें अन्यथा उन्हें बदनाम कर दिया जाएगा। कांग्रेस ने प्रधान न्यायाधीश को बदनाम करने की मुहिम चला रखी है। सोशल मीडिया पर कांग्रेस के इशारे पर कोर्ट के फैसलों की खुलकर आलोचना हो रही है। उन फैसलों को भी कटघरे में खड़ा किया जा रहा है जो प्रधान न्यायाधीश सुप्रीम कोर्ट ने नहीं दिए हैं।
फिर चाहे वह साधवी प्रज्ञा और असीमानंद को बाइज्जत बरी किए जाने का मामला हो या फिर माया कोडनानी और कर्नल पुरोहित को राहत देने का मामला। इन सारे फैसलों को कुछ इस तरह प्रचारित किया जा रहा है कि यह सब केंद्र तथा कई राज्यों में सत्तासीन भारतीय जनता पार्टी के इशारे पर किए गए फैसले हैं। जबकि सच तो यह है कि न्यायालय उपलब्ध साक्ष्य और दोनों पक्षों के वकीलों द्वारा प्रस्तुत की गई दलीलों बहस आदि के आधार पर निर्णय देता रहा है। असीमानंद, साध्वी प्रज्ञा, कर्नल पुरोहित आदि के मामले में कोर्ट के निर्णय यह साफ बता रहे हैं कि हिंदू आतंकवाद का मिथक केंद्र में सत्तासीन तत्कालीन कांग्रेस नीत सरकार द्वारा पैदा किया गया था। कांग्रेस ने ही जान-बूझकर यह प्रचारित किया कि हिंदुओं में भी आतंकवादी होते हैं और वह मालेगांव, समझौता ब्लास्ट जैसे मामलों में लिप्त हैं। लेकिन एनआईए तब भी कुछ साबित नहीं कर पाई और आज तक कुछ साबित करने में नाकाम रही है। एक दशक तक कांग्रेस की सरकार थी, जो लोग दोषी थे उन्हें कांग्रेस ने फांसी पर क्यों नहीं लटकाया क्यों? उनमें से किसी एक को भी सजा दिलाने में कांग्रेस नाकामयाब रही?
न्यायपालिका सत्तासीन दलों के इशारे पर काम करती है ऐसा मान भी लिया जाए, तो कांग्रेस लगातार 10 वर्ष तक सत्ता में रहने के बाद भी किसी एक हिंदूवादी नेता अथवा इन मामलों में फंसाए गए उन कथित हिंदू आतंकवादियों को सजा क्यों नहीं दिला पाई? एक दशक तक सीबीआई से लेकर तमाम एजेंसियां कांग्रेस के इशारे पर काम कर रही थीं, तब उन एजेंसियों ने इन लोगों के खिलाफ पुख्ता सबूत क्यों नहीं जुटाए?


प्रधानमंत्राी नरेंद्र मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्राी हुआ करते थे उस दौरान भी कांग्रेस केंद्र में 10 वर्ष तक सत्तासीन रही। लेकिन प्रधानमंत्राी के खिलाफ भी कांग्रेस सुई की नोक बराबर सबूत नहीं जुटा पाई। कांग्रेस ने केवल प्रोपेगंडा किया। दुष्प्रचार किया। हिंदू आतंकवाद का भ्रम पैदा किया गया। डर दिखाया गया। दिग्विजय सिंह जैसे नेता बाटला हाउस एनकाउंटर पर अपनी ही सरकार के खिलाफ खड़े हो गए और आजमगढ़ किसी तीर्थ स्थल की तरह बार-बार जाने लगे।
इन सब का अर्थ क्या है क्या? यह सब आज कांग्रेस द्वारा लाए गए अध्यादेश से जुड़ा हुआ दिखाई नहीं देता? क्या यह सिद्ध नहीं हो रहा है कि वही प्रोपेगंडा नए सिरे से करने का प्रयास हो रहा है? सरकार को लपेट नहीं पा रहे हैं तो इस देश की न्याय व्यवस्था को बदनाम करने का प्रयास किया जा रहा है। जो कोर्ट याकूब मेमन जैसे हत्यारे का पक्ष आधी रात को सुन सकता है आज उसी कोर्ट को कांग्रेस के इशारे पर पक्षपाती और हिंदूवादी कहकर अलग तरीके का माहौल बनाने का प्रयास किया जा रहा है।
जस्टिस दीपक मिश्रा का कार्यकाल अब ज्यादा नहीं बचा है। लेकिन वह जिस तरह देश के संवेदनशील मामलों पर दिन-रात कार्य कर रहे हैं। उसे देखकर कांग्रेस सकते में हैं कांग्रेस को आशंका है कि कहीं राम मंदिर पर कोई निर्णय न्यायमूर्ति मिश्रा द्वारा ना दिया जाए। कांग्रेस इस निर्णय में हिंदुओं के पक्ष को जीतता हुआ नहीं देखना चाहती। ना ही कांग्रेस यह चाहती है कि इस मामले का कोई सर्वसम्मति से समाधान निकले। इसलिए राजनीतिक रोटियां सेकने का प्रयास किया जा रहा है।
अकेले राम मंदिर की बात नहीं है। अनेक ऐसे फैसले हैं जो सुप्रीम कोर्ट की दहलीज पर पड़े हुए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने ही तीन तलाक को असंवैधानिक घोषित किया है। हलाला और बहुविवाह पर भी कोर्ट का निर्णय आने वाला है। कांग्रेस को इन सारे प्रगतिशील और मानवतावादी फैसलों पर घोर आपत्ति है, क्योंकि कांग्रेस नहीं चाहती कि मुस्लिम महिलाओं को न्याय मिले। वह यह भी नहीं चाहती कि हिंदुओं को न्याय मिले। वह केवल वैमनस्य और नफरत का वातावरण चाहती है।
हिंदुओं को दबाना और उनके साथ अन्याय करना चाहती है। जब कांग्रेस का एजेंडा सफल नहीं हुआ तो उसने देश के प्रधान न्यायाधीश को ही कटघरे में खड़ा कर दिया। ऐसा करके उसने न्यायपालिका को जिस स्थिति में डालने का प्रयास किया है वह देश के लिए भी घातक है। कांग्रेस ने एक नया ट्रेंड शुरू कर दिया है जो आगे चलकर खतरनाक साबित हो सकता है।
विडंबना की बात है कि कभी शाहबानो प्रकरण में न्यायाधीश के लोकप्रिय और प्रगतिशील निर्णय को कांग्रेस ने संसद में बदल दिया था। आज उसी संसद में एक बार फिर न्यायपालिका को पराजित करने और उसकी इज्जत तार-तार करने की कोशिश कांग्रेस द्वारा की जा रही है। लेकिन सुकून की बात यह है कि इस बार कांग्रेस का यह मंसूबा कामयाब नहीं होने वाला। अब कांग्रेस सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी में है क्योंकि महाभियोग के प्रस्ताव को उपराष्ट्रपति ने ठुकरा दिया है। जिस कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश के खिलाफ कांग्रेस संसद की शरण में गई थी अब उसी कोर्ट की शरण में कांग्रेस सरकार के खिलाफ गई है। इससे ज्यादा हास्यास्पद और दुखद कुछ हो ही नहीं सकता। देश के सामने तमाम मुद्दे और चुनौतियां हैं, लेकिन कांग्रेस तो एक वर्ग विशेष को खुश करने के चक्कर में देश की न्यायपालिका की जड़ काटने में लगी हुई है।

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