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अपरिचय का परिचय

विद्यावाणी

अपरिचय का परिचय

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संसार के प्रत्येक पदार्थ अपने-अपने गुणधर्म को लिये हुए होते हैं। अपने-अपने परिणाम को लिये हैं। आप लोगों की सभी प्रकृति बाहर की ओर होती है, भीतर की ओर दृष्टिपात नहीं कर पाते। जो ज्ञानी पुरुष होते हैं, बाहर से परिचित होने के कारण अपरिचित के साथ खोये हुए रहते हैं। अज्ञानी प्राणी वहाँ तक पहुँच ही नहीं पाता। पहुँचना चाहे तो पहुँच सकते हैं, यह असम्भव नहीं है। एक उदाहरण से समझ में आ जायेगा।

एक पेन लिया। वह पेन बिलकुल नया था अर्थात् कोरा था। वह स्याही से परिचित नहीं था। अब उस पेन की नीब को एक स्याही की दवात में डुबा दिया एवं बाहर निकाल लिया। एक चाँदी का कटोरा जो पानी से लबालब भरा था उसमें उस नीब को डुबा दिया। क्या होगा। वह पूरा कटोरे का पानी जो सफेद था, नीला हो गया। अंतिम यात्रा कैसी होती है, वहाँ तक हमको ले चलना है। उस कटोरे के पानी को एक पानी से भरी बाल्टी में डाल दिया, वह पूरी बाल्टी का पानी नीला हो गया। चश्मे के साथ भी देख सकते हो। अब हम इसकी यात्रा और करना चाहते हैं। अब तक बाल्टी के पानी को एक टेंक में डाल देते हैं। हमने टेंक में डालते हुए अपनी आँखों से देखा भी है कि यह वही नीला पानी है। अब उस टेंक के पानी को नदी में डाल दिया है।

आपने देखा जो यात्रा नदी तक चली गयी। हम यह नहीं कह सकते की जल नीला नहीं है क्योंकि हमें विश्वास है, वह विश्वास निराधार भी नहीं है। अब वह नदी बहकर सागर में मिल गयी, आपने देखा सरिता सागर में मिल गयी। सरिता में टेंक, टेंक में बाल्टी और बाल्टी में उस चाँदी के कटोरे का नीला पानी वही है जो नीब से स्याही निकाली गयी थी। वह यात्रा सागर तक जाकर मिल गयी। मात्रा एक ही सागर नहीं, प्रत्येक द्वीप के चारों ओर दूने-दूने विस्तार को लिये हुए समुद्र/सागर है। वह समुद्र का पानी वाष्प बना सूर्य की तपन से। उस वाष्प में भी नीलिमा के कण विद्यमान हैं। इसके उपरांत और-और तीन लोक तक वह फैल जाता है।

वह केवल ज्ञान है। प्रत्यक्ष ज्ञान है इसलिये जान रहा है। श्रद्धान की यात्रा जिसके घट में हो रही है वही ज्ञानी है। दुनिया की इस आपाधापी में अज्ञानी ज्यादा हैं। ज्ञान से वह अपने को मानी-क्रोधी इत्यादि रूप मानता चला जाता है। ज्ञानी प्रतिक्षण ज्ञान का अनुभव करता जा रहा है, श्रद्धान की दृढ़ता तो बढ़ाता जा रहा है। वह दृढ़ता उसे केवल ज्ञान की ओर ही लेकर जायेगी। केवल ज्ञान के रूप में वह नीलिमा बहुत-बहुत गुणा है। ऐसा हमारी क्षमता के बारे में आचार्यों ने कहा है।

जो व्यक्ति प्रतिपल उस ज्ञान को अपनी बुद्धि का विषय बनाना चाहे बना सकता है। ज्ञान वही है बस कटोरे की नीलिमा हमें नजर आ रही है। वही धीरे-धीरे कम होते-होते सागर/सरिता में तो बिल्कुल नजर ही नहीं आ रही, पर वहाँ नीलिमा है- नहीं ऐसा कहने का साहस किसी में नहीं हो सकता क्योंकि हमने उसे अपनी आँखों से देखा। ये विश्वास का विषय है। उदाहरण भूलना भी चाहो तो हमारा उदाहरण भूल नहीं सकते। आपको अपनी सफेद धोती में भी नील नजर आयेगी। हमारी कोई पत्रिका आदि तो है नहीं, आप लोगों ने तो यहाँ सुन लिया, इसे उन तक भी पहुँचाने का काम आपका है जो यहाँ नहीं हैं। इसे सब तक भेज देना। अच्छी-अच्छी बात को सब को बाँटना चाहिए। श्रद्धान की आँख बंद करते ही वह दिखेगा। झलकेगा। समय आप सबका हो गया है।

कुण्डलपुर, 05.05.2016

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