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कुर्बानी से स्वार्थ तक अजित गुप्ता

परदे पर

कुर्बानी से स्वार्थ तक अजित गुप्ता

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दो फिल्म – दो कहानियाँ लेकिन मैं अटक गयी हूँ, एक सोच पर! अभी “राजी” और “102 नाॅट आउट” देखी। राजी 1971 की कहानी तो 102 आज याने 2018 की कहानी। एक परम्परा निभाने की कहानी तो दूसरी परम्परा तोड़ने की कहानी। राजी में 20 साल की बेटी को पिता कहते हैं कि पाकिस्तान में शादी करनी है और वह भी जासूस के रूप में।

बेटी अचानक से लिये पिता के निर्णय को स्वीकार करती है और कहती है कि आपने अपने पिता की बात मानकर यह कार्य किया तो मैं भी अपने पिता की बात मानकर काम करूँगी।

दूसरी ओर 102 नाॅट आउट में दादा अपने पुत्रा से कहते हैं कि मैं मेरे बेटे को तेरे बेटे से हारने नहीं दूँगा! यहाँ बेटा, पिता को अकेला छोड़कर विदेश में अपनी दुनिया बसा लेता है तब दादा अपने बेटे से परम्परा तोड़ने को कहते हैं कि बेटे को लात मार दे।
50 साल में कितना परिवर्तन आ गया है! बेटी पिता की परम्परा निभाने को अपना सब-कुछ कुर्बान कर देती है लेकिन आज बेटा अकेले पिता की सुध भी नहीं ले रहा है।

राज़ी कहानी है कुर्बानी की तो 102 नाॅट आउट कहानी है स्वार्थ की। इन 50 सालों में हमने कुर्बानी से स्वार्थ तक की यात्रा की है। देश, समाज, परिवार को तोड़ते हुए अकेलेपन के स्वार्थ को सिद्ध किया है। 20 साल की एक लड़की अपने देश के लिये पिता की इच्छा को अंगीकार करती है और दुश्मन देश में जाकर अपने पति के सामने ही बंदूक तानकर खड़ी हो जाती है और कहती है कि देश के सामने प्रेम कुछ नहीं होता तो दूसरी तरफ पढ़-लिखकर युवक देश और परिवार को छोड़कर दूसरे देश के पैरों में गिर जाता है। मुझे इन दोनों मूवीज में यही समानता नजर आयी कि हम देश-समाज-परिवार के लिये जज़्बा लेकर चले थे और आज यहाँ आकर खड़े हैं जब दादा ही पोते को लात मारने के लिये बेटे को सीख देता है।

हम परम्परा निभाते-निभाते कब परम्परा तोड़ने पर ताली बजाना सीख गये, पता ही नहीं चला। इस देश में आज भी स्वार्थ पर थूका जाता है और कुर्बानी को सलाम कहा जाता है। राजी सीधी-सादी सी फिल्म है लेकिन कुर्बानी के जज़्बे के कारण ही लोगों को आकर्षित कर रही है वहीं 102 नाॅट आउट भी लात मारने की परम्परा पर ताली बजाने पर मजबूर कर रही है। समय हो तो फिल्म अवश्य देखें।

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