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रंग भेद – प्रज्ञा जायसवाल

कहानी

रंग भेद – प्रज्ञा जायसवाल

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रमेश आज बहुत खुश है क्योंकि उसके घर मे एक नया मेहमान आने वाला है उसकीं पत्नी अस्पताल में भर्ती और वह आॅपरेशन थियेटर के बाहर खड़ा हो डाॅक्टर साहेबा का इंतजार करता, कुछ ही क्षणांे पश्चात अंदर से किसी नन्हे से बच्चे की किलकारिया गूंज उठती है और डाॅक्टर साहेबा बाहर आकर रमेश से कहती हैं।

बधाई हो रमेश आपके यहा लक्ष्मी आयी है।

जैसे ही रमेश सुनता है वह खुशी से फूले नही समाता, लेकिन रमेश की माँ की आँखंे नम हो जाती मानो घर मंे कोई मुसीबत का पहाड़ टूट पड़ा हो, जैसे ही रमेश उसकी बेटी को गोद में लेता और उसकी पत्नी को दिखाता है और बोलता, देखो कोमल हमारे यहां लक्ष्मी आयी है मैं बहुत खुश हँू आज से इसका नाम पवित्रा है।

कोमल बेटी को देख खुश होती उसकी सावली सलोनी नन्ही परी, लेकिन कोमल के यहां बेटी आते ही उसकी सासु माँ का बर्ताव बदल जाता है और वह रोज़ उसे ताने मारने लगती है मानो उस बच्ची ने उनका कुछ बिगाड़ा हो। अब पवित्रा अपने नन्हे कदमो में पायल की छम-छम आवाज करती घर आँगन में घूमती ओर रमेश के मन को खूब भाती, रमेश उसका दाखिला घर के पास के विद्यालय में कराता वह रोज स्कूल जाती और उच्च श्रेणी के अंक लाती लेकिन दादी की घृणा भरी निगाहें ओर उसके साँवले रंग की वजह से परिवार के लोगो की बाते उसे मन ही मन चुभती लेकिन वह यह बात किसी से नहीं कहती।

रमेश जब आॅफिस से शाम के समय घर वापस आता तो कोमल उसे दिनभर की सारी बाते बताती ओर उसकी माँ के सुनाए गये हर ताने का जिक्र करती लेकिन रमेश उसे समझाता ओर शांत रह सो जाने को कहता कोमल अपने दर्द को सह शांत रहती। कुछ इस कदर दिन गुजर जाते और पवित्रा अब मैट्रिक की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण कर काॅलेज में दाखिला लेती ओर साथ ही न्च्ैब् की परीक्षा की तैयारी के लिए कोचिंग जाती।

लेकिन उसकी दादी और परिवार के सदस्यों को पवित्रा का पढ़ाई करना और बाहर जाना पसंद नही आता वह कोमल को ताने देते और कहते क्या करोगी पढ़ाई करवा के शादी करदो लड़की जवान हो गयी है। पवित्रा कि शादी के लिए कई रिश्ते आते लेकिन उसके सांवलें रंग की वहज से सब मना हो जाते। कोमल और रमेश की चिंता दिनों दिन बढ़ती जाती और वहां पवित्रा भी आपने सावंले होने को एक श्रापित सा महसूस करने लगती, दादी के तानो और परिवार वालो की बाते सुन मन ही मन दुःखी हो जाती।

लेकिन वह मन लगाकर न्च्ैब् की परीक्षा की तैयारी करती और घर के सभी काम मे माँ का हाथ बटाती, रमेश उसकी बेटी को हर एक छोटे से छोटा और बड़े से बड़ा सभी काम सिखाता, वह नाम कि ही तरह पवित्रा हृदय वाली और संस्कारी, गुणवान, होनहार, निडर लड़की लेकिन सिर्फ उसका सांवला होना उसे मन ही मन दुःखी कर देता, खैर ईश्वर का दिया कोई नहीं बदल सकता है। अब पवित्रा के इम्तहान का समय आ गया, न्च्ैब् की परीक्षा, वह सुबह जल्द उठकर स्नान ध्यान कर आपने माँ और पिताजी को बता कर परीक्षा देने रिक्शे से अपने सेंटर की ओर निकल जाती है और परीक्षा देती है शाम को वह जब घर आती है तो कोमल उससे पूछती है। बेटा पेपर कैसा गया। आने-जाने में कोई परेशानी तो नही हुई।

पवित्रा माँ को सब ठीक था कहकर अपने कमरे में चली जाती है। ओर फिर वही दिनचर्या दादी और रिश्तेदारो की बाते लड़की जवान हो गयी है शादी कर दो घर में बैठाना है क्या और साथ ही उसका सांवला होना जो की कोमल और रमेश को चिंतित कर देता जैसे उसे अब अपनी माँ की बाते सच लगने लगी हो मानो बेटी का जन्म ही पाप लगने लगा हो। आज का दिन पवित्रा के लिए खुशी का दिन है न्च्ैब् का परिणाम घोषित होने वाला है।

रमेश सुबह-सुबह उठकर बाहर कुर्सी पर बैठकर चाय की चुस्कियाँ लेता और हाथ मे अखबार उठाता, तभी दरवाजे पर कोई दस्तक देता, रमेश जाकर दरवाजा खोलता ओर देखता की पवित्रा की कोचिंग का स्टाफ और उसके मित्रा, पहले तो वह देखकर घबरा जाता और पूछता, क्या हुआ हमारी पवित्रा से कोई गलती हो गयी क्या, उसके कोचिंग वाले सर रमेश से कहते है नही रमेश बाबू ऐसा कुछ नही है मुँह मीठा करिये आप को बहुत-बहुत शुभकामनाएं पवित्रा ने न्च्ैब् की परीक्षा में जिले में प्रथम स्थान प्राप्त किया है और उसका चयन हुआ है। आप बहुत खुश किस्मत है जो आपकी पवित्रा जैसी बेटी है मंै आप को नमन करता हुँ। यह सब बातें सुनकर रमेश और कोमल कि आँखे भर जाती है जिस बेटी को आज वह बोझ समझने लगा था आज उसने उसका सीना चैड़ा कर दिया।

यह देख उसकी दादी उसे गले लगा रोने लगती है और खूब आशीर्वाद देती है साथ ही परिवार के अन्य सदस्य भी पवित्रा की सफलता को देख खुश होते है और आज से उनका हृदय परिर्वतन होता है हर माँ-बाप अपनी बेटी को पवित्रा जैसे बनने के लिये के लिए शिक्षा देते है। इस प्रकार पवित्रा को देख लोगो के मन से रंगभेद और बेटा-बेटी में भेद की भावना खत्म होती है।

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