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आत्मबल – डाॅ. दीप्ति गुप्ता

कहानी

आत्मबल – डाॅ. दीप्ति गुप्ता

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शांति को अशांत करने और उसे नीचा दिखाने की कोशिश आचार्यजी नके अवश्य की… किंतु शांति के आत्मबल के आगे आचार्यजी को परास्त होना ही पड़…।

घड़ी में दो बजे और परीक्षा पुस्तिकाएं जांचती मृणाल ने झटपट काॅलबेल बजाकर लक्ष्मण से आठ चाय कैन्टीन से ले आने के लिए कहा। थकी आंखों से चश्मा उतारकर, उसने आंखों को हौले से हथेलियों से ढंककर मानो उन्हें उर्जा देने की कोशिश की। तभी डाॅ. शर्मा ने कमरे में प्रवेश करते हुए मृणाल को आंखें ढंके हुए देखकर, चुटकी लेते हुए कहा,‘‘क्यों मैडम, ध्यान लगाया जा रहा है?’’
मृणाल तुरन्त आंखें खोलती बोली,‘‘आइए, आइए, काॅपियां जांचते-जांचते थक गई थी। सो सोचा दो मिनट आंखें बन्द करके इन्हें आराम दिया जाए।’’

इतने में बेला उप्रेती, शान्ति जोशी, सुरेश पाटिल, अतनु चटर्जी, प्रो खासनवीस सभी एक के बाद एक आते गए और कमरे में रखी बड़ी मेज के चारों ओर रखी कुर्सियों पर बैठते ही ताजा खबरों की चर्चाओं में मशगूल हो गए। तभी डाॅ. पाटिल बोले,‘‘आजकल छात्रों का मानसिक स्तर कितना गिर गया है !’’

मृणाल उनकी बात के समर्थन में बोली,‘‘जब शैक्षिक स्तर ही नहीं रहा, तो मानसिक स्तर होगा ही कहां?’’

उसके कथन को खुद पर लेते हुए डाॅ. पाटिल बात काटते बोले,‘‘भई, हम तो दिन-रात मेहनत करके, स्वयं को ‘अपडेट’ करके ही छात्रों को पढ़ाते हैं तो शैक्षिक स्तर पर तो आप कोई आक्षेप नहीं कर सकतीं।’’

मृणाल उन्हें शब्दजाल में उलझाती हुई बोली, ‘‘डाॅ. पाटिल, मैंने ‘शिक्षण’ स्तर पर तो कोई टिप्पणी नहीं की। मैंने तो ‘शैक्षिक’ स्तर की बात कही है, हम सब कितना भी अच्छा पढ़ाएं, पर जब तक पाठ्यक्रम उपयुक्त नहीं होगा, छात्रों में स्वाध्याय की आदत नहीं होगी तो उनका मानसिक स्तर कैसे विकसित होगा?’’

डाॅ. पाटिल थोड़े खिसिसाए से, अपने रजिस्टर के पन्ने उलटने-पलटने लगे, तभी लक्ष्मण ट्रे में कप और गर्मागरम चाय की केतली लेकर आ गया, चाय तो आ गई थी, निश्चित समय पर, लेकिन विभागाध्यक्ष डाॅ. आचार्य अपनी पुरानी आदत के अनुसार चाय की मंडली में अनुपस्थित थे।

तीन बजे के लगभग विभागाध्यक्ष डाॅ. आचार्य अपनी गिद्ध दृष्टि साथी प्रवक्ताओं के कमरों में डालते, काॅरिडोर से सीधे अपने कमरे में जा बैठे, पीछे-पीछे लक्ष्मण भी उनके हिस्से की बची चाय केतली में लिए उनके कमरे में जा पहुंचा।

‘‘सबने चाय पी ली?’’ आचार्य जी ने खोजी वाक्य मुंह से बाहर फेंका।

‘‘जी हां,’’ कहते हुए लक्ष्मण ने कप में चाय डाली और बड़े अदब से श्रीमान अध्यक्ष महोदय के सम्मुख रख दी, ठंडी, बदरंग हुई उस चाय को घूरते हुए आचार्य जी का मन हुआ कि उसे लक्ष्मण के मुंह पर दे मारें। तभी फोन की घन्टी मिमयाई। आचार्य जी ने चोंगा उठाया तो उधर से श्रीमती जी बोलीं,‘‘आप चश्मा घर पर ही भूल गए हैं. चपरासी को भेज दीजिए, ले जाएगा।’’

आचार्य जी बोले,‘‘रहने दो, आज का काम मैं चला लूंगा।’’

अब अपने कमरे में बैठे-बैठे उन्होंने चश्मे के बिना अगले दो-तीन घन्टे कुछ काम न करने का ‘मास्टर प्लान’ बनाया। 3रू20 पर क्लास भी लेनी थी. उनके खुराफाती दिमाग में लगी चालाकी की सूई रफ्तार से इधर-उधर घूम रही थी. ठीक 3रू35 पर, दो छात्रा उनके कमरे में आ पहुंचे और साहस बटोर कर बोले,‘‘सर, क्लास नहीं लेंगे क्या ?’’

आचार्य जी ने नाटकीय ढंग से, मेज पर रखे फालतू पुराने कागजों से सिर उठाते हुए कहा,‘‘अरे 3.35 हो गया? कुलपति कार्यालय से जरूरी काम आ गया, अभी पूरा करना आवश्यक है। क्या आप लोग कक्षा में खामोशी से बैठकर स्वाध्याय करेंगे?’’

छात्रा क्या बोलते, उन्हें तो पढ़ने से, 45 मिनट के लेक्चर से बिना मांगे छुट्टी मिली, इससे बड़ी मौजमस्ती की बात क्या हो सकती थी।
छात्रों को टालकर, मन ही मन अपनी कामचोरी पर खुश होते हुए, आचार्य जी को ध्यान आया कि पासवाले कमरे में, कुछ ही देर में प्रो. खासनवीस आते ही होंगे, सो अपने को झूठ-मूठ के काम में उलझाने के इरादे से उन्होंने लिपिक सक्सेना को इन्टरकाॅम से अन्दर बुलाया। पहले तो दो मिनिट उसे खड़ा रखा, फिर छत की ओर ताकते हुए धीरे-धीरे बोलना शुरू किया,‘‘क्यों, आजकल अपनी सीट पर बहुत कम रहते हो और जितने समय बैठते हो उतने समय में कोई न कोई मिलने वाला आता ही रहता है, यदि ऐसे ही चलता रहा तो विभाग का काम क्या करोगे?’’

बेचारा सक्सेना इस झूठे आरोप को सुनकर तिलमिला गया। फिर भी सफाई देता बोला,‘‘सर, मैं तो हमेशा सीट पर रहता हूं अभी आपने बुलाया तो सीट पर था कि नहीं? और सर मिलने वाले कौन आते हैं मेरे पास? कोई भी तो नहीं।’’

‘‘अच्छा, ऐसा क्या? असल में बेला मैडम कह रही थी कि तुम काम कम और बातें ज़्यादा करते हो।’’

सक्सेना मन ही मन बेला मैडम को कोसता, गुस्से से भरा चला गया।

श्रीमान आचार्य, अपनी इस ‘कूटनीति’ पर गर्व से भर गए, बरामदे में आने-जाने वालों पर तो उनकी नजर जमी ही रहती थी. तभी उन्होंने देखा कि मृणाल उनके कमरे की ओर आ रही है, उन्होंने चटपट स्वयं को एक फाइल में ऐसा व्यस्त किया कि जैसे वे हर ओर से बेखबर हैं।

मृणाल का स्वर उनके सतर्क कानों से टकराया,‘‘क्या मैं अन्दर आ सकती हूं?’’

सुनकर भी अनसुना कर श्रीमान आचार्य फाइल के कागज उलटने-पलटने में लगे रहे। मृणाल तो उनकी नस-नस से वाकिफ थी, दरवाजा धकेलकर मेज के पास आकर उनके सामने छात्रों की अंक तालिका रखती हुई बोली,‘‘पहले और दूसरे पेपर से संबंधित सभी प्रवक्ताओं ने अंक मुझे दे लिए है, बस आपने ही अभी तक तीसरे पेपर की कापियां जांच कर, अंक मुझे नहीं दिए हैं।’’

एयरगन के छर्रों की मानिन्द मृणाल के मुंह से निकलते वे तीखेपन से भरे नपे तुले शब्द अपराध बोध की भावना से भरे आचार्य जी के जहां-तहां जाकर गड़ गए। उन्होंने हौले से, थके-थके, फाइल से सिर उठाकर, चश्मा विहीन चुंधियाई आंखों को मिचमिचाते हुए कहा,‘‘ठीक है, कल तक सारी कापियां जांचकर देने का प्रयास करता हूं।’’

मृणाल बिना कुछ बोले सधे कदमों से वापिस चली गई, अपने दिल दिमाग की कलौंस के कारण मृणाल की तो खामोशी भी चुनौती से भरी लगती थी आचार्य जी को।

अगले दिन जब डाॅ. शर्मा 12रू30 की क्लास लेकर विभाग में आए तो क्या देखते हैं कि बरामदे में अध्यक्ष के कमरे के सामने छात्रा-छात्राओं की भीड़ लगी है, उनके पास पहुंचते ही उन्होंने पूछा,‘‘आप लोग यहां कैसे खड़े हैं?’’

सभी एक स्वर में खीझे से बोले,‘‘सर, दो दिन से हम सुबह दो-तीन घन्टे, फिर दोपहर को भी दो-दो घन्टे अपने फाॅर्म पर आचार्य सर के हस्ताक्षर लेने के लिए यहां आते हैं, पर सर कभी मिलते ही नहीं।’’

छात्रों से शिकायत सुनकर, डाॅ. शर्मा को आचार्य के प्रति बड़ी वितृष्णा पैदा हुई, सोचने लगे कैसा व्यक्ति हैं? महाशय बच्चों को अनुशासन, समय की महत्ता, बड़ा-बड़ा लेक्चर झाड़ते हैं, लेकिन स्वयं क्या करते हैं इन छात्रों के साथ? प्रत्यक्ष में वे छात्रों से बोले,‘‘आप लोग चिन्ता न करें और अपनी कक्षाएं बिल्कुल न छोड़ें, आज मैं आचार्य जी से बात करता हूं, कल आप ठीक 11.00 बजे यहां आ जाएं।’’

दो बजे सब चाय के लिए इकट्ठा हुए तो डाॅ शर्मा ने छात्रों के प्रति आचार्य जी के गैरजिम्मेदाराना रवैये का मुद्दा साथियों के सामने रखा, सभी ने एक स्वर से छात्रों को इस तरह तंग करने पर आचार्य की भर्त्सना की।

प्रो खासनवीस ने डाॅ शर्मा के साथ आचार्य जी से इस मुद्दे पर बात करने का बीड़ा उठाया !

आज तो आचार्य जी 3.00 के बजाए 3.25 पर घर से विभाग में लौटे, प्रो खासनवीस ने जैसे ही अपने कमरे की चिक से उन्हें आते देखा, वे तुरत-फुरत, शर्मा जी के साथ उनके कमरे में जा धमके. आचार्य जी का माथा ठनका, लेकिन वे बड़ी विनम्रता से बोले,‘‘आइए, आइए, बैठिए।’’

बोलने के लिए उतावले, प्रो खासनवीस तुरंत मुद्दे पर आ गए,‘‘देखिए, आचार्य जी, आपसे यह कहते हमें अच्छा नहीं लगता, लेकिन विवश होकर कहना पड़ रहा है कि युवा शक्ति को फाॅर्म पर दस्तखत के लिए इस तरह खिझाना ठीक नहीं और यह नैतिक दृष्टि से भी गलत है सो, आप हस्ताक्षर वाले काम को कल निपटा दीजिए।

आचार्य जी सिर हिलाते, चश्मे से गोल-गोले आंखें घुमाते घिघियाते से बोले,‘‘सही कहा आपने! कल हो जाएगा यह कार्य। हां, बाहर भीड़ लगनी भी ठीक नहीं है रोज-रोज. कल छात्रा कितने बजे आएंगे?”

‘‘11.00 बजे,’’ डाॅ. शर्मा ने जवाब दिया। ‘‘ठीक है, कल मैं 10.30 पर ही आ जाऊंगा,’’ आचार्य जी तपाक से बोले।

अगले दिन आचार्य जी ठीक 10.30 पर विभाग में पहुंच गए और देखते ही देखते 11.30 तक काम निपट गया।

आज सुबह शोध छात्रा मकरंद जोशी ने पीएचडी की उपाधि प्राप्त करने के उपलक्ष्य में, डिनर पर आने का विशेष आग्रह करते हुए, आचार्य जी सहित सभी व्याख्याताओं के हाथ में खूबसूरत-सी निमन्त्राण पत्रिका थमा दी।सभी को उसका प्रेम निमन्त्राण स्वीकार करना पड़ा।

रविवार को सभी 8.00 बजे तक ‘होटल सागर’ में पहुंच गए, लेकिन उपस्थित नहीं थे तो सिर्फ आचार्य जी। साढ़े आठ बजते न बजते आचार्य जी, न सिर्फ अपनी पत्नी, बल्कि अपने बहू बेटे, छोटे बेटे व बेटी सहित ‘सपरिवार’ भोज की गरिमा बढ़ाने हेतु पधार गए। मकरन्द एक बारगी तो भौंचक-सा रह गया उस फौज को देखकर, लेकिन अगले ही पल, सहज होता उनकी आवभगत में लग गया।

अगले दिन चाय की बैठक में सभी साथियों ने आचार्य महाशय की पिछली रात की गरिमाहीन हरकत पर शर्मिन्दगी जाहिर करते हुए उनके बारे में मशहूर किस्से छेड़ दिए तो विभाग में नई-नई आई शान्ति जोशी बोलीं,‘‘जरा हमें भी तो पता चले उनका असली रूप! क्या विस्तार से नहीं बताएंगे? अब मैं स्थाई हो गई हूं, प्रोबेशन पीरियड समाप्त हो गया है। मैं भी अपने विभागाध्यक्ष के महान करतब जानने का अधिकार रखती हूं।’’

उसके इस तरह बोलने के ढंग पर सब खिलखिला पड़े और जोश में भर कर प्रो खासनवीस ने बताना शुरू किया कि किस तरह आचार्य जी अपने शोध छात्रा से झोले भर-भरकर सब्जी मंगवाते थे और रुपए भी बेचारे छात्रा की जेब से ही खर्च करवाते थे। मृणाल ने बताया कि उनकी शोध छात्रा कमलिनी का शोध कार्य तब तक पूरा नहीं होने दिया गया, जब तक कि उसने बेडकवर, मेजपोश काढ़-काढ़कर, मैडम के ब्लाउज, बेटी के सलवार सूट सिल-सिलकर उनका पेट नहीं भर दिया।

शान्ति सोचने लगी कि क्या उच्च शिक्षा प्राप्त, उच्च पद पर आसीन, वह भी आदर्श माने जाने वाले, शिक्षण व्यवसाय में रहकर, कोई इंसान, इस तरह की हल्की और घटिया हरकतों से स्वयं को इतना गरिमाहीन बना सकता है? शान्ति को सोच में डूबा देख मृणाल ने टोका,‘‘अरे मैडम जोशी, आप किस दुनिया में खो गईं ? अभी नई हैं आप और आदर्शों से सम्पन्न भी, हम भी जब नए-नए आए थे तो विभागीय राजनीति के शिकार होकर, बड़े तमतमाए और छटपटाए थे, लेकिन धीरे-धीरे हमने आचार्य जी की चालबाजियों से खुद को बचाने के गुर सीख लिए।’’
शान्ति को मृणाल की सारी बातें सुनाई भी दे रही थी और समझ भी आ रही थीं, फिर भी वह अन्तरतम में कहीं खोई हुई थी, जैसे वह अपने मूल्यों और उन पर टिकी अपनी आस्था को अन्दर कहीं सहेज कर रख लेने को व्याकुल थी कि कहीं उस पर बाहरी धूल, कूड़ा कचरा न बैठ जाए !

शान्ति अपने कमरे में अलमारी खोलकर रजिस्टर व किताबें निकाल रही थी, तभी लक्ष्मण ने आकर कहा,‘‘मैडम, आचार्य जी ने आपको बुलाया है।’’

शान्ति का दिल एक अंजानी आशंका से जोर-जोर से धड़कने लगा. अगले ही क्षण स्वयं को व्यवस्थित करते हुए उसने खुद से पूछा-ऐसी घबराहट क्यों? उसे हिम्मत जुटानी पड़ेगी। बुलाया ही तो है। यह सब सोचती-सोचती वह अध्यक्ष के कक्ष में पहुंची और बोली,‘‘जी सर।’’
अपनी आंखें कागजों में गड़ाए हुए ही आचार्य बोले,‘‘बैठिए, कैसा लग रहा है यहां? अब तो सभी से अच्छी तरह परच गई होंगी आप?’’ यह कहते हुए वे शान्ति की ओर देखने लगे।

‘‘जी,’’ संक्षिप्त जवाब दिया शान्ति ने। थोड़ी देर के मौन के बाद आचार्य जी बोले,‘‘कल छुट्टी है। हो सके तो किसी समय घर आइए, थोड़ा-सा आपका मार्गदर्शन कर देंगे तो अच्छा रहेगा।’’

‘‘जी,’’ शान्ति के मुंह से सहसा ही ‘नहीं’ के बदले निकल गया।

वहां से निकली तो शान्ति सोच में पड़ गई…घर बुलाकर कैसा मार्गदर्शन करेंगे आचार्य जी? जाए या न जाए? कह देगी- तबियत खराब हो गई अचानक. लेकिन वह बिना बात झूठ क्यों बोले? डरने की क्या बात है? वह अनुभवहीन है और आचार्य जी अध्यक्ष ही नहीं अपितु बुजुर्ग भी हैं, अनुभवी हैं। उनके बारे में जितनी बातें सुनी हैं, वे सच ही हों जरूरी तो नहीं। इस तर्क-वितर्क में उलझी शान्ति ने अगले दिन अध्यक्ष के घर जाने का मन बना ही लिया।

शान्ति रविवार को दोपहर में, खाने के बाद सब कामों से फारिग होकर 2रू00 बजे के लगभग आचार्य जी के घर पहुंची। काॅलबैल का बटन दबाया तो अच्छा-खासा समय लगाकर बड़े इत्मीनान से किसी ने दरवाजा खोला, एक महिला ने मुस्कान के साथ शान्ति का स्वागत किया, उसे बैठाया और नाम पूछकर, अन्दर आचार्य जी को बताने चली गई। शान्ति इस बीच, कमरे की सजावट, कोने में सजे आर्टिफैक्ट्स, दीवार पर लगी पेन्टिंग्स आदि देखती रही, तभी श्रीमती आचार्य आईं तो शान्ति ने उनका अभिवादन किया, दोनों बैठकर बातें करने लगे, इतने में आचार्य जी भी बासी चेहरे के साथ आ खड़े हुए, शान्ति पुनः उनके अभिवादन में खड़ी हो गई। उबासी लेते हुए आचार्य जी बोले,‘‘बैठिए, बैठिए, घर खोजने में परेशानी तो नहीं हुई?’’

‘‘जी नहीं,’’ शान्ति ने संक्षिप्त सा उत्तर दिया, कुछ पल इधर-उधर की फालतू बातों के उपरान्त आचार्य जी पुनः बोले,‘‘एक-एक कप मसाले वाली चाय पिलाएंगी क्या श्रीमती जी?’’

वहीं बैठे-बैठे अपनी मेड को चाय का आदेश देती हुई श्रीमती आचार्य नाक-भौं सिकोड़ती हुई बोलीं,‘‘शान्ति जी, अभी आपको कुछ नहीं पता। विभाग में एक से एक छंटे हुए लोग भरे पड़े हैं…’’ और उन्होंने जो सबका गुणगान करना शुरू किया तो किसी को भी नहीं बखशा।
आचार्य जी अपनी श्रीमती जी का साथ देते हुए बोले,‘‘देखिए शान्ति जी आप अभी भोली हैं, विभागीय राजनीति क्या होती है यह आपको नहीं पता। मृणाल और बेला से भी जरा दूर ही रहना।’’

शान्ति को लगा कि ये क्या है? किसी से बातें मत करना, निकट मत होना, यहां आना, वहां मत जाना… ये कैसे अध्यक्ष है और कितनी कपटता से भरा इनका मार्गदर्शन है? वह सोच में पड़ गई, उलझनों से भरे दिमाग और कसमसाहट के साथ आचार्य जी व उनकी पत्नी से विदा लेकर शान्ति घर पहुंची, रात तक उसकी बेचैनी इतनी बढ़ गई कि उसने मन ही मन निर्णय लिया कि अगर आचार्य जी ने अपनी पत्नी सहित उस पर इतनी तानाशाही चलाई तो, तो मामला ‘डीन’ और ‘कुलपति’ तक ले जाएगी, घुट-घुट कर, सह-सह कर नौकरी नहीं होगी उससे। यदि विभाग अध्यक्ष और उनकी पत्नी के संकेतानुसार चलेगी, तो वह प्रवक्ता थोड़े ही रहेगी…एक बन्धक, एक कठपुतली बन कर रह जाएगी। वह जो भी करेगी डंके की चोट पर करेगी।

सवेरा होने पर, उत्साहविहीन-सी वह उठी और 11.00 बजते-बजते विभाग में पहुंच गई, उसके उखड़े-उखड़े और तनावग्रस्त चेहरे ने सभी का ध्यान आकर्षित किया, सबके द्वारा उसकी खैरियत पूछे जाने पर वह सिर भारी होने का मामूली-सा कारण बता कर सबको टालती रही। दो दिन बाद आचार्य जी के कक्ष में पाठ्यक्रम से संबंधित बैठक हुई। बैठक शुरू होने से पहले उन्होंने सबसे पूछा कि पाठ्यक्रम कितना हो गया है और कितना शेष है, सभी का कार्य ठीक था, यदि पाठ्यक्रम पिछड़ा हुआ था तो सिर्फ स्वयं अध्यक्ष महोदय का। फिर न जाने एकाएक आचार्य जी को क्या सूझा, बोले,‘‘शान्ति जी, कुछ छात्रा हमसे कह रहे थे कि आप ठीक से नहीं पढ़ाती, उन्हें आपका पढ़ाया समझ नहीं आता।’’

यह सुनते ही शान्ति बौखला-सी गई। उसका चेहरा तमतमा गया, पर वह शांत स्वर में बोली,‘‘सर, जिसने यह आक्षेप लगाया है, आप उन छात्रों को हम सबके सामने बुलाइए और मैं उनसे पूछूंगी कि उन्हें कब और क्या समझ में नहीं आया? ठीक है मेरे पढ़ाने के ढंग में कहीं कोई कमी हो सकती है, पर मैं उन्हीं से जानना चाहूंगी कि यह बात उन्होंने पहले मुझसे क्यों नहीं कही और सीधे आपसे कहने क्यों आए? पहले तो यही पूछूंगी, हां, यदि मैं उनके कहने पर मना कर देती, यदि उन्हें न समझाती, उनकी समस्याओं का समाधान न करती, तब आपसे शिकायत करते, पर सीधे आपके पास चले आए?’’ शान्ति की ऐसी हिम्मतभरी, खरी प्रतिक्रिया और चेहरे पर झलकते सच्चाई के तेज को देखकर आचार्य जी ऐसे निष्प्रभ हो गए कि उनसे कुछ जवाब देते न बन पड़ा। ‘‘अरे छोड़िए, मैंने उनकी शिकायत थोड़े ही स्वीकार की है। वो तो उन लोगों ने कहा तो मैंने सोचा आप तक यह बात पहुंचा दूं।’’ शान्ति फिर भी अपनी बात पर अड़ी हुई बोली,‘‘नहीं आप अभी बुलवा लीजिए उन छात्रों को, दूध का दूध और पानी का पानी हो जाना चाहिए’’

मीटिंग में सभी को शान्ति का बिना घबराए हुए, सटीक व सधा हुआ जवाब देना बेहद अच्छा लगा। कहीं न कहीं सब महसूस कर रहे थे कि आचार्य जी की गलत बातों का विरोध इस ढंग से न करके वे उनकी बातों को बढ़ावा देने में थोड़े-बहुत भागीदार बन गए थे। इधर शांति ने आज जीवन की आपदाओं से संघर्ष करने की एक नई शक्ति क्रान्तिकारी रूप से जाग उठी थी, बड़े ही आत्मविश्वास के साथ उसने जंग से भागने का नहीं, पलायन करने का नहीं, वरन् डट कर उसका सामना करने का निर्णय ले लिया था। आखरि क्यों वो अपने मूल्यों, संस्कारों व आत्मसम्मान की रक्षा करने से चूके? इन चीजों की रक्षा के लिए हर छोटे से छोटे और बड़े से बड़े संकट का सामना, वह डट कर करेगी! और अपने कार्य को परिश्रम, लगन व निष्ठा से करती रहेगी। आचार्य जी से कुछ कहते नहीं बन रहा था, पूरा का पूरा स्टाफ उनकी ओर देखकर जैसे जवाब मांग रहा था, उन्होंने वहां से खिसक लेना उचित समझा, आखिर शान्ति के भीतर जागा आत्मबल अब वहां मौजूद हर प्रवक्ता के भीतर बहता प्रतीत हो रहा था।

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