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पाप हरो देवा – निर्मला तिवारी

कहानी

पाप हरो देवा – निर्मला तिवारी

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क्या दीपा, एक अविवाहितयों की बेटी का अपनी माँ से सवाल करना उचित है? क्या उसका क्रोध सही है? क्या दीपा के क्रोध का भाजन बुने उसकी माँ….! जो ज़माने से लड़ी है… क्या अपनी बेटी का मुकाबला नहीं सकती ….?

दीदी खाने में क्या बनना है अभी?महराजिन ने आकर पूछा। आज जाने क्यों मन बड़ा अन्यमनस्य हो रहा था। बेबी से पूछ लो वह जो कहे वही बना देना। बेबी कह रही है उन्हीं से पूछ लो। उन्हीं से? मन में चोट सी लगी। यह दीपा भी। अच्छा जो तुम्हें ठीक लगे बना लो।
दीपा तुम्हारी सहेली पांखुरी का फोन आया था। कल उसका बर्थ डे है। तुम्हें बहुत आग्रह के साथ बुलाया है। ऊंचे स्वर में ही मैं बोली थी, लेकिन कोई जवाब नहीं। दीपा इतनी दूर तो न थी कि मेरी आवाज उस तक न पहुंचे। मुझे गुस्सा आ गया- मैं तुमसे कुछ कह रही हूं न दीपा। सुना नहीं? मैंने सुन लिया है और मैं किसी पार्टी-वार्टी में नहीं जाने वाली। क्यों नहीं जाऊंगी यह बात अच्छी तरह जानती हैं आप। धीमा, लेकिन ऐसा ठंडा, ऐसा जहरीला स्वर था दीपा का कि एक कंटीली लहर मेरे तन मन में व्याप गई। अपनी ही बेटी के घातक काटों को झेलते समय तिलमिला ही तो उठती थी मैं। उसके व्यवहार में छलकता तिरस्कार मुझे जड़ बना देता था। केवल आंखों और स्वर में आग किस को टुकड़ों में बांटा जा सकता है, यह काम दीपा बखूबी कर सकती है। टूटी हुई आवाज में मैं जेसे खुद से ही पूछ रही थी।

नहीं जाऊंगी, क्योंकि….। दीपा ने अपनी आंखों के दहकते अंगारे मेरे सीने में उतार दिए थे। मुझे शर्म आती है सबके बीच। लोग पूछते हैं, बातें करते हैं तरह-तरह की। अंधेरों का यह फंदा तो आपका बुना था न। मैं क्यों उलझूं इसमें। मेरे पास किसी भी प्रश्न का जवाब नहीं है। न मेरा डाइवोर्स हुआ है, न मैं विधवा हूं, लेकिन पति? विवाह? पटाखों के अनारदानों की तरह जो पल चकाचैंध देकर अनंत अंधकार पीछे छोड़ गया, उसे क्या कहूं। मेरे साथ जो घटित हुआ वह सबके साथ नहीं होता, लेकिन हुआ तो उसे कैसे नकार दूं?

कैसे थे वे दिन!

पापा बहुत परेशान थे उन दिनों!

राधा, व्यापार में लगातार घाटा हो रहा है। किसी भी सूरत में संभल नहीं पा रहा हूं। वैसे ही परेशान रहता हूं, ऐसी हालत में बेटी, तुम्हारी अम्मा की यह बीमारी…। क्या करूं, कुछ समझ में ही नहीं आ रहा है।

पापा की परेशानी ने मेरा चैन खत्म कर दिया था। माहौल में तनाव ही तनाव था। अम्मा की बीमारी में मुझे चैन कहां थी? घर की जमा पूंजी खत्म होती जा रही थी। हे प्रभु, क्या मर्जी है तेरी। जवान बेटी ब्याहने को बैठी है और घर का यह हाल…। चिंता के मारे न जिया जा रहा है न…।

मुझे लगता था जैसे मेरी सांसें घुटकर रह जाएंगी। तभी दूर देश अमेरिका से आया था शांतनु। तपते हुए रेगिस्तान में शीतल हवा के झोंके जैसे सुखद अनुभूति लेकर आते हैं, ठीक वैसा ही लगा था शांतनु का आगमन। ऐसा लगा जैसे ईश्वर ने खुशियों की सौगात देकर साक्षात फरिश्ता ही भेज दिया हो।

अम्मा के दूर के रिश्ते का भतीजा शांतनु सुंदर, ऊंचा-पूरा, युवा इंजीनियर, बेहद आकर्षक और सम्मोहक व्यक्तित्व का स्वामी था। अम्मा से मिलने एक बार आया तो अक्सर आने लगा। क्यों? उस समय तो कोई भी समझ नहीं सका। उसकी रोचक दिलकश बातों से माहौल खुशनुमा हो उठता था। उस समय तो ठहाके लगाते हुए हम भूल ही जाते कि मकान गिरवी पड़ा है कि सारी जमा-पूंजी कर्ज की भेंट चढ़ चुकी है कि अम्मा की बीमारी दिन पर दिन लाइलाज होती जा रही है…। आज एक युवा बेटी की मां कैसे कहूं कि मैं शांतनु के जादुई व्यक्तित्व से बुरी तरह सम्मोहित हो गई थी। कैसे स्वीकार करूं कि अम्मा से ज्यादा मुझे उसका इंतजार रहता था। घर में अनिश्चित असुरक्षा की तपिश थी तो शांतनु का आगमन वसंत की बयार।

कालेज के फस्र्ट इयर में थी तब। अठारह-उन्नीस साल की उम्र किस किशोरी को सौंदर्य मंडित नहीं कर देती? मेरा दर्पण मुझसे झूठ थोड़े ही बोलता था फिर कालेज में सबकी आंखों में उमगती सराहना की कविता मैं बखूबी पढ़ सकती थी। सबसे बढ़कर तो थी शांतनु की वह मुग्ध अपलक दृष्टि जो मेरे रूप का सशक्त प्रमाण पत्रा थी। उसकी रीझी हुई नजरों से उपजी वह सिहरन वह गुदगुदी लाज के वे मादक झोंके एक किशोरी के लिए अस्वाभाविक तो न थे। उस दिन घर लौटी तो अम्मा को देखकर सारी थकान भूल गई। कैसी खिली-खिली लग रही थीं अम्मा।

क्या बात है अम्मा। आज तो तुम बहुत खुश लग रही हो। मुस्कुराहट की चांदनी ने अम्मा के चेहरे को जैसे चमका दिया था।
उस दिन शांतनु मुझसे मिलने आया तो मुस्कुरा कर रहस्यपूर्ण ढंग से बोला था- राधा, आज मैं बुआ से मिलकर आया हूँ। घर जाकर उनसे जरूर पूछना। एक जोरदार सरप्राइज तुम्हारा इंतजार कर रहा है। मुझे पूरा विश्वास है तुम्हें वह जरूर पसंद आएगा।
शांतनु की वह शरारती मुस्कान। अम्मा से बातें करते हुए मेरी नजरें कमरे में घूम रही थीं। कहां है सरप्राइज? दिखाई तो कुछ भी नहीं दे रहा है।

अम्मा का चेहरा दमक रहा था और आंखों में खुशी के आंसू थे। हम तो जी गए बेटी। शांतनु ने हमें नई जिंदगी दे दी हैं हमें क्या पता था कि हमारे भाग्य का दरवाजा इस तरह खुलने वाला है। आश्चर्य, आज अम्मा बीमार ही नहीं लग रही थीं। मैं कुछ भी समझ नहीं पा रही थी। अम्मा, क्या किया है शांतनु ने? वे किसी सरप्राइज की बात कर रहे थे। दिख तो नहीं रहा कहीं कुछ। हां बेटी, सरप्राइज ही तो है। उसने खुद तुम्हारा हाथ मांगा है। वह भी बिना किसी दान-दहेज के।

पुलकित अम्मा जैसे दुबारा जी उठी थीं और मैं? देह गुलाल की पंखुरियों की तरह हल्की हो गई थी। मन जैसे शतदल कमल। दुनिया बहुत सुहानी और सब-कुछ अच्छा-अच्छा सा लगने लगा।

बहुत जल्दी ही सब-कुछ तय कर लिया गया। शांतनु के अमेरिका लौटने का समय नजदीक आ गया था, इसलिए सगाई की रस्म सादगी से संपन्न हुई। अब मैं शांतनु की वाग्दत्ता थी। नाता जुड़ गया था उससे। यह तय हुआ कि छह माह बाद जब शांतनु अमेरिका से लौटेगा तब शादी होगी और मैं उसकी दुल्हन बन कर अमेरिका चली जाऊंगी। वासंती बयार का एक मीठा सा झोंका मेरे जीवन को महका गया। अब शांतनु मंगेतर था मेरा। उससे मिलना-जुलना, साथ घूमना, प्यार करना गुनाह तो न था। एक संक्षिप्त सा समय हमने साथ जिया और खुलकर खूब जिया। शांतनु के पास अधिक समय नहीं था। हम एक-एक पल संजो लेना चाहते थे। उन रुपहले दिनों में कोई समस्या, कोई दुख मुझ पर हावी नहीं हो पा रहा था। उस छोटी सी समय-सीमा में मैंने सुखों के समंदर पार कर लिए थे।

वक्त अपनी गति से उड़ रहा था। उन दिनों हम वक्त के पंखों पर सवार थे। हरियाले को तरसे आंगन में सावन झूमकर बरस रहा था। मैं कैसे न भीगती? उस उम्र में रसीली फुहारों से भला कौन बच पाता है। फिर जब मुझे विश्वास था कि यह सावन तो मेरा अपना है, क्यों उसे मंै अपनी दोनों बांहों में नहीं बांधती? शांतनु तो मेरी सांस-सांस में बस गया था।

अम्मा और पापा खुश थे, बेहद खुश। भावी दामाद ने उन्हें भी खुश रखने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। अम्मा की दवाएं अब शांतनु ही लाते थे। पापा के लाख मना करने के बावजूद शांतनु ने घर में ढेर लगा दिए थे उपहारों के।

तब लगता था आकाश मेरी मुट्ठी में है। शांतनु को पाकर अब कुछ और पाने की चाह नहीं रही। कैसी नादान थी मैं। फटी झोली में संसार की संपदा समेटना चाहती थी।

देखते ही देखते शांतनु के अमेरिका जाने का समय हो गया। उनके बिना लंबे छह माह कैसे बिताऊंगी, आंसू रोके नहीं रुक रहे थे। ढेर सारे आश्वासन, वादे, तसल्लियां मेरे पल्लू में बांधकर शांतनु चले गए। मेरी चहल-पहल भरी दुनिया पहले की तरह सुनसान हो गई। कुछ रुपहली, सुनहली कामनाएं थीं मेरी अंजुरी में। हर कुंआरी लड़की की तरह मैं भी उनसे अपने मन-प्राणों का शृंगार करना चाहती थी, लेकिन दुर्भाग्य कि एक ही ठोकर से किस खाई में गिर कर आंखों से ओझल हो गए थे मेरे ख्वाब? अच्छे दिनों की चिड़िया चहचहाकर उड़ गई और रह गई सन्नाटे की गूंज। उस सुबह अम्मा की चीख-पुकार सुनकर नींद टूटी- राधा, ओ राधा, जल्दी आ। देख तो तेरे पापा कैसा कर रहे हैं?
तुरंत गिरती-पड़ती दौड़कर गई तो पापा की सांसों को मैंने थमते देखा। बिजनेस का भारी घाटा उनके कमजोर हार्ट पर बहुत भारी पड़ा था।
पापा, पापा, क्या हो गया आपको? इधर देखिए पापा, कुछ तो बोलिए…।

अम्मा का जर्जर शरीर पत्ते की तरह कांप रहा था। मैं फूटकर रो पड़ी थी, लेकिन अम्मा नहीं। वे कभी मुझे देखतीं, कभी पापा की निर्जीव देह को। कुछ पलों बाद उनकी दुर्बल देह लुढ़क गई। अम्मा क्या कर रही हो, उठो, उठो जल्दी देखो पापा चले गए हमें छोड़कर….।
कच्चे धागों में बंधी जीवन डोर इस बड़े झटके से टूट चुकी थी। अब मैं अकेली थी। इस इतनी बड़ी दुनिया में एकदम अकेली। उस भीषण पल को हतबुद्धि अनुलाई से देखती ही रह गई मैं। यह भयानक आघात कैसे सहा, कितनी देर बाद होश लौटे, देानों की अंत्येष्टि कब हुई, मुझे पता नहीं चला। शांतनु। बहुत याद आया वह। तब कहां पता था कि मेरे बुरे दिनों की शुरुआत है यह। आतंक का एक और लावा मेरा इंतजार कर रहा था।

शांतनु के पत्रा आते ही कहां थे? मैं नादान चकोरी की तरह उस चांद की ओर टकटकी लगाए थी जो बादलों में गुम हो ही चुका था। फोन लगता नहीं था। नंबर बदल गया था। यह तो बहुत बाद में पता चला कि शांतनु वास्तव में बहुरूपिया था। मैं जान गई कि अमेरिका में उसकी एक खूबसूरत बीवी और प्यारा सा बच्चा है। वह खुशहाल पारिवारिक जीवन बिता रहा है जिसमें मेरे लिए कोई जगह थी ही नहीं। अंगारे ही अंगारे भर गए थे जीवन में। सोचने-समझने की बुद्धि पथरा गई थी। फिर एक दिन मैंने महसूस किया कि प्रकृति ने भयंकर संदेश भरी पाती मेरे देह द्वार पर फेंक दी है। आप मां बनने वाली हैं। बहुत-बहुत बधाई हो। लेडी डाॅक्टर ने मुस्कुरा मुझे सूचना दी थी। एक अनाथ, कुंआरी के लिए यह कैसी डरावनी खबर थी।

दुर्भाग्य हर कदम पर मेरा पीछा कर रहा था। पग-पग पर ठोकर खाकर मैं घायल होती जा रही थी। मेरा टूटकर बिखर जाना निश्चित दिख रहा था।

क्या करूं, कैसे जिऊं? मेरे सामने दो ही रास्ते थे। खुद को समाप्त करके सारी समस्याओं से मुक्त हो जाऊं या फिर सारी समस्याओं से जूझते हुए जीने की कोशिश करूं। मैंने दूसरा रास्ता चुनने का फैसला किया। ठोकरों का ही सहारा लेकर खड़े होने की कोशिश की। मैंने हिम्मत से जीने के विषय में सोचना शुरू किया। तब मुझे लगा घोर अंधेरे को चीर कर हल्की सी प्रकाश की किरण झांकने की कोशिश कर रही है। मैंने महसूस किया कि अब मैं नितांत अकेली नहीं हूं। कोई है जो मेरे साथ मेरे अंदर है। मेरे अकेलेपन को दूर करने का सहारा ईश्वर ने भेज दिया है। क्यों अपने प्राण दूं मैं? कोई है जिसे मुझे अपने साथ जिंदा रखना है।

खुद को जीतकर बाहर निकली तो सामने विकराल प्रश्नों के पहाड़ टकराने को तैयार खड़े थे। शर्म, लिहाज, संकोच, मर्यादाएं, रिवाज, संस्कार और क्या कुछ नहीं। मैंने सबको झटक कर दूर कर दिया और इस इकलौते सहारे को थाम लिया। डूबते को सहारा मिला और दीपा मैंने तुम्हें संसार में लाने का इरादा और मजबूत कर लिया। न खुद मरूंगी न बच्चे को मारूंगी। जिसे धरती पर आने का अधिकार खुद विधाता ने दिया है उसे मैं क्यों छीनूं?

ऐसे दुस्साहसी फैसले तो आज भी लोगों के गले नहीं उतरते, इतने वर्ष पूर्व कैसे मान्य होते? तुम्हें कैसे बताऊं कि कैसे-कैसे सवालों और वारों से घिरती-बचती आज मैं यहां तक पहुंची हूं, सोचती हूं तो खुद ही गहरे आश्चर्य में डूब जाती हूं। सारे फैसले मुझे ही तो करने थे। हर फैसले के पहले मुझे अपने अंदर चलनेवाली लड़ाई का सामना करना पड़ता था। बेटी को उसके पिता का ही नाम दिया- दीपा सक्सेना, लेकिन अपना नाम कैसे बदलूं? शांतनु की विवाहिता तो मैं थी नहीं। तुम्हारे नन्हें वजूद ने मुझे जीवन का जहर पीने का हौसला दिया। अब घर में कोई तो था जिसके लिए मैं आफिस से जल्दी घर लौटने के लिए व्याकुल रहती। थकी-हारी घर आती तो वो नन्हें-नन्हीं कदम मेरी ओर दौड़ पड़ते। दो प्यारी बांहें मुझसे लिपट जातीं। वे प्यारी, मासूम, खुशी से चमकती आंखें। एक मीठी सी निष्पाप आवाज थी जो मुझे मम्मी कहकर पुकारती थी। तुम्हें देखकर तुम्हारे लिए रातों को जागकर तुम्हारी हर खुशी को पूरा करते हुए मैं जी गई।

एक अकेली युवा मां के लिए इस विषैली दुनिया में बच्चे का पालन-पोषण करना कितना कठिन होता है, यह मैंने जिया, भोगा, महसूस किया। दूसरा कोई इस दर्द को कैसे महसूस कर सकता है। मेरी गोद से उतर कर जब तुमने बाहरी दुनिया में कदम रखा, मैं तुम्हें खोती चली गई। तुम बड़ी होती गईं, तुम्हारे सवाल मुझसे बड़े होते गए। सारे सवाल मुझे बेनकाब करने के लिए ही होते। तुम्हारी रगों में खून की जगह घृणा जो बहने लगी थी।

मम्मी! पहले इस संबोधन में कैसी चाशनी घुली रहती थी- आप कहती हैं मेरे पापा कहीं दूर रहते हैं, कहां आप बताती क्यों नहीं? उन्होंने आपको छोड़ा या आपने उन्हें? वे कभी हमसे मिलने आते क्यों नहीं। बढ़ती उम्र के साथ तुम्हारे अंदर की चिंगारी ज्वाला बनने लगी। खूब समझती हूं मम्मी। कोई यों ही किसी को छोड़ नहीं देता। बिना कारण के कहीं कोई…।
कड़वे शब्दों के अंदर घुपे हुए वीभत्स आरोप का मेरे पास कोई जवाब ही न था। शर्म, अपमान और ग्लानि से काला चेहरा कहां छुपाऊं, समझ नहीं पाती। अपनी ही बेटी को सफाई देने से तो धरती मेें गड़ जाना बेहतर है। दीपा, सिर्फ तुम्हारे सहारे मुझे जीने का हौसला मरने नहीं दिया। तुम्हें देखकर ही मैं जीती रही। मेरा रूपरंग और शांतनु की भव्य कद-काठी, दोनों के सम्मिश्रण ने तुम्हें मोहिनी छवि से संवार दिया था। मुझे तो तुम पर गर्व है बेटी, लेकिन तुम?

आपकी कलंक कथा…। आपकी बेटी होने की शर्म मुझे जीने नहीं देती। आपने क्यों किया ऐसा…। तुम्हारे सुलगते सवालों ने हमारे रेशमी संबंधों को झुलसा दिया है। हम मां-बेटी नहीं, नदी के दो तट हो गए हैं? दीपा, क्या तुम्हें याद है तुमने कब, कितने दिन पहले मुझे मम्मी कहकर पुकारा था? कब आखिरी बार मुझसे लिपटकर सोई थीं। मैं तरस रही हूं कि तुम फिर से छुटपन के समान जिद करके अपनी फरमाइशें मुझसे पूरी करवाओ। एक अभेद दीवार है हमारे बीच। इस तरफ उदासी और हताशा की बाहें थामे तुम हो तो उस तरफ चिंता, दुख, पश्चाताप की तपिश तले मैं खड़ी हूं। मेरी गागर तो खाली ही थी, तूने उसका खालीपन उजागर करके क्या पाया बेटी। दुनिया का तो मैंने सामना कर लिया, लेकिन आज तो मैं अपनी ही बेटी के सामने हूं। जिन नजरों को मैंने किसी के सामने उठने नहीं दिया वे क्या अब तेरे तीखे तेवरों का सामना नहीं कर पाएंगी। मुझे उन दिनों की अपनी मजबूती विस्मृत थोड़े ही हुई है। क्षमा करें, मेरे व्यक्तिगत जीवन पर सिर्फ मेरा अधिकार है। वह कैसे गुजरा या कैसे गुजरेगा, यह सिर्फ मेरे दायरे में है। इसमें झांकने का अधिकार मैं किसी को नहीं देती। कैसे दृढ़ता से मैं लोगों की जिज्ञासाओं को दुत्कार देती थी। अब? अब तो घर के अंदर, दीवारों से ही भाले-बर्छियां निकल आई हैं। बचाव के लिए क्या करूं?
मां हूं, बेटी की नाराजगी दूर करने के लिए उससे क्षमा मांगू? क्यों? उसे जन्म देकर क्या पाप किया है मैंने? अपने छले जाने की माफी मांगू? यह क्या भूल थी मेरी?

दीपा, तू बेटी है मेरी। तेरी घुटन, तेरी पीड़ा से बखूबी परिचित हूं मैं। वह तो समय ही समझाएगा तुझे कि तेरी मां गुनहगार नहीं थी। लेकिन मैं- मिस राधा वर्मा- अब तुझे भी अपने ऊंगली उठाने का अधिकार नहीं दूंगी। अपने पीड़ा का कारण नहीं बनने दूंगी। समझना होगा मुझे कि यह मां दुनिया से और खुद से लड़कर वज्र हो चुकी है जो तब नहीं झुकी तो अब क्या झुकेगी? अपने लिए लड़ने का हौसला मुझमें तब भी था, अब भी हैं
अपने जीवन की स्वामिनी मैं ही रहूंगी, हमेशा। किसी से नहीं हारी, तो अपनी बेटी से क्यों हारूं। नारी हूं, अपने स्वत्व की रक्षा करूंगी ही।

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