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आखिर यह संघ वाले ऐसा क्यों करते हैं ? – मनोज जोशी

प्रसंगवश

आखिर यह संघ वाले ऐसा क्यों करते हैं ? – मनोज जोशी

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आज की तारीख में राष्ट्रपति, उप राष्ट्रपति, प्रधानमंत्राी और तो और कई राज्यों के राज्यपाल, मुख्यमंत्राी संघ की शाखाओं से निकले हैं। केंद्रीय मंत्रियों और राज्यों में मंत्रियों की तो गिनती ही नहीं। संघ वाले चाहते तो इनमें से किसी को भी बुला लेते, लेकिन पहुंच गए प्रणब दा के पास। अब प्रणब दा संघ के तृतीय वर्ष ओटीसी करने वाले स्वयंसेवकों को संबोधित करेंगे। यह एक तरह से संघ का दीक्षांत समारोह है। संघ में तृतीय वर्ष शिक्षित स्वयंसेवक मतलब ‘सर्वाधिक’ पका हुआ और सम्मानीय स्वयंसेवक। अब ऐसे स्वयंसेवक के दीक्षांत समारोह में भी बुलाया किसे? जिसे खुद नहीं पता कि संघ क्या है? बल्कि जिसकी राजनीतिक शिक्षा- दीक्षा एक ऐसी पार्टी में हुई जिसका आधार ही संघ का विरोध है। सवाल यह है कि ‘पता नहीं यह संघ वाले ऐसा करते क्यों हैं?’

पता नहीं प्रणब दा वहां क्या बोलेंगे?

संघ का नेतृत्व और स्वयंसेवक क्या समझेंगे और देश का मीडिया उसका क्या अर्थ लगा कर क्या पेश करेगा? लेकिन जो भी है सवाल अब भी बरकरार है कि ‘आखिर यह संघ वाले ऐसा करते क्यों हैं?’ प्रणब दा ने खुद कभी संघ के खिलाफ कोई बयानबाजी की या नहीं, लेकिन संघ वालों ने जरूर उनका विरोध किया था। राष्ट्रपति के पद पर प्रणब दा की उम्मीदवारी पर भाजपा ने कांग्रेसी बैकग्राउंड वाले आदिवासी नेता पीए संगमा को समर्थन किया था।यह बात तो खुद प्रणब दा को भी याद होगी और संघ वालों को भी। लेकिन फिर भी वे उनके पास पहुंच गए… गजब ही है भाई..। सवाल और गहरा गया कि ‘आखिर यह संघ वाले ऐसा करते क्यों हैं?’

यह कोई पहला मौका नहीं

यह कोई पहली बार नहीं है जब संघ ने ऐसा अजीब काम किया हो। आजादी से पहले जब संघ अपने शिशु अवस्था में था तब महात्मा गांधी और डाॅ. भीमराव आंबेडकर भी संघ के स्वयंसेवकों को संबोधित कर चुके हैं। मेरी जानकारी के अनुसार जयप्रकाश नारायण भी संघ के किसी कार्यक्रम में जा चुके हैं। संघ के सिर पर गांधी हत्या का आरोप लगा। लेकिन संघ के स्वयंसेवक आज भी शाखा में प्रातः स्मरण में उनका नाम आदर से लेते हैं? उसमें डाॅ. अंबेडकर तो शामिल हैं हीं। जब गहराई में जाओ तो पता लगता है कि गणतंत्रा दिवस की परेड में आरएसएस शामिल हो चुका है और वह भी उन नेहरू जी के कार्यकाल में जिनकी नीतियों को लेकर आज भी संघ विरोध करता रहता है। इससे तो सवाल और गहरा गया कि आखिर संघ वाले ऐसा करते क्यों हैं?

संघ ने कभी कोई आसान काम हाथ में लिया ही नहीं

जब संघ की कार्यप्रणाली में आप इसका जवाब तलाशो तो पता लगता है कि संघ का डीएनए ही ‘ऐसा’ है। डाॅ. हेडगेवार ने संघ की स्थापना उस समय की जब पूरा समाज बिखरा हुआ था। यह अपने आप में एक मुश्किल काम था। संघ के प्रचारकों ने आजीवन अविवाहित रह कर, प्रचार से दूर रह कर चुपचाप अपने काम में लगे रहने का संकल्प लिया। आज भी मीडिया से संघ काफी दूर है। यह भी कोई आसान काम नहीं था। देश में जहां भी आपदा की खबर आती है स्वयंसेवकों की टोलियां खुद की और घर वालों की चिंता करने की बजाय सेवा में जुट जाते हैं। भैया ध्यान से विचार करोगे तो पता चलेगा कि संघ ने कभी कोई आसान काम हाथ में लिया ही नहीं।

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