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सवाल तो फिर बहुत सारे उठते हैं – प्रकाश भटनागर

प्रसंगवश

सवाल तो फिर बहुत सारे उठते हैं – प्रकाश भटनागर

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क्या वाकई डाॅ. प्रणब मुखर्जी द्वारा आरएसएस का बुलावा स्वीकार करने को मुद्दा बनाया जाना चाहिए? वह भी तब जबकि पूर्व राष्ट्रपति कांग्रेस को अलविदा कह चुके हैं। यदि वे राष्ट्रपति या कांग्रेसी रहते हुए ऐसा करते, तब भी इस पर सवाल उठाने का भला क्या तुक बनता है?

सैद्धांतिक रूप से प्रणब दा का उसी दिन कांग्रेस से नाता खत्म हो गया था, जब वह राष्ट्रपति निर्वाचित हुए। पार्टीगत निष्ठा तज देने के बाद उन्होंने संघ प्रमुख से राष्ट्रपति भवन में एक से अधिक बार मुलाकात की। एक भेंट तो ऐसे समय भी नहीं टाली गयी, जब प्रणब दा की अर्द्धांगिनी का निधन होने के चलते उनके शेष सभी कार्यक्रम रद्द कर दिए गए थे। मुमकिन है कि कांग्रेसी चश्मा उतार देने के बाद डाॅ. मुखर्जी संघ से प्रभावित हुए हों। शायद यही वजह है कि उन्होंने संघ के कार्यक्रम में जाने की सहमति दे दी है।

कांग्रेस नेता संदीप दीक्षित ने मुखर्जी के इस कदम पर सवाल उठाया है। प्रणब दा को प्रकारांतर से उनके संघ-विरोध की याद दिलाई है। आखिर किसी व्यक्ति के किसी विधि सम्मत संगठन, कानूनी रूप से उचित आयोजन पर जाने पर ऐसा आचरण क्यों? तो फिर उठाइये बाकी ‘चले जाने’ पर भी सवाल। पूछिए कि 1971 के भारत-पाक युद्ध के समय इंडियन एयरलाइन्स के पूर्णकालिन पायलट राजीव गांधी क्यों अवकाश हासिल कर पत्नी और बच्चों सहित इटली चले गए थे। जबकि हालात को देखते हुए बाकी सारे पायलट्स की छुट्टी निरस्त कर दी गयी थी। यह सवाल भी उठाइये कि 1977 के चुनाव में अपनी सासु माँ इंदिरा गाँधी के चुनाव हारने की खबर मिलते ही सोनिया पति राजीव और बच्चों को लेकर इटली के दूतावास में क्यों जा छिपी थीं।

दीक्षित मुखर्जी की इस सहमति को भारी मन वाले अंदाज में उनका ह्रदय परिवर्तन बता रहे हैं। अब ह्रदय तो जवाहरलाल नेहरू का भी एडविना माउंटबैटन के लिए अलग अंदाज में धड़क उठा था। खुद एडविना की बेटी पामेला हिक्क माउंटबेटन ने अपनी किताब डाॅटर आॅफ एम्पायरः लाइफ एज ए माउंटबेटन’ में लिखा था, ‘माँ लेडी एडविना माउंटबेटन और जवाहर लाल नेहरू के बीच में गहरे प्रेम संबंध थे, और मैंने ये अच्छी तरह से महसूस भी किया था।’ कांग्रेस द्वारा जब इन सब पर सवाल नहीं उठाये गए तो फिर प्रणब को लेकर यह हाय तौबा क्यों?

सवाल तो अनंत हैं। राहुल गांधी क्यों उस समाजवादी पार्टी की चैखट पर गए, जिसने उत्तरप्रदेश से कांग्रेस का जनाधार खत्म करने में अहम् भूमिका निभाई है। सोनिया गाँधी कर्नाटक में क्यों लपक कर उन मायावती से मिलने गईं, जिन मायावती के सहयोग से ही सपा ने यूपी में कांग्रेस को राजनीतिक रसातल में ला पटका। प्रश्न यह भी कि क्यों राहुल गाँधी को चारा घोटाले के सिद्ध दोषी लालू प्रसाद यादव से मिलने जाना चाहिए था?

किसी के कहीं जाने की आजादी को उसके पाँव में अतीत या पार्टी की बेड़ियाँ पहनकर बाधित मत कीजिये। और ऐसा करना ही है तो लगे हाथ सोनिया गाँधी से भी पूछ लीजिये कि इलाज के लिए उन्हें विदेश जाने की क्या जरूरत है? क्या उन्हें उस देश की चिकित्सा व्यवस्था पर यकीन नहीं है, जिस देश में उनकी पार्टी ने 60 साल से ज्यादा शासन किया है! जिस देश के लिए वे जीने और मरने की बात करती हैं!

दीक्षित जी, प्रणब दा कांग्रेस की दहलीज कब की लांघ चुके हैं। जाने दीजिये उन्हें अपनी इच्छा के अनुपालन में। आप तो घर के अंदर घुसकर ऊपर उठाये गए एक भी सवाल का जवाब मांग लीजिये। जवाब के रूप में आपका जो हश्र होगा, उससे आपको खुद पता  चल जाएगा की संघ और कांग्रेस के बीच कितना विराट अंतर है।

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