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क्षत्राणी विदुला

नारी गौरव

क्षत्राणी विदुला

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विदुला सौवीर देश के राजा की पत्नी थी। पति निधन के समय उसका पुत्रा संजय बहुत छोटा था। सिंधुदेश के राजा ने उनका राज्य छीन लिया था। बड़े होने पर उसने सिंधुदेश के राजा से मुकाबला किया पर संजय का स्वभाव कोमल, भीरु होने के कारण वह युद्ध की विभीषिका से आतंकित था। युद्ध से पराभूत होकर वह घर आया तब विदुला ने उसकी भत्र्सना की। उस समय वह बड़ी दीनता से अपनी माता से कहने लगा ‘माँ! मैं तेरा एक मात्रा पुत्रा हँू। मेरी मृत्यु से क्या तुझे सुख मिलेगा?’

विदुला क्षत्राणी थी। स्वाभिमानी और तेजस्विनी थी। उसमें युद्धभूमि से लौट कर आये हुए पुत्रा की बड़े कठोर शब्दों में भत्र्सना की, उसने संजय से कहा, तू वीरकुल में उत्पन्न हुआ राजपूत है, इस कुल में किसी ने कभी भयवश मस्तक नहीं झुकाया न कभी किसी से याचना की। उसी कुल में जन्मा अब तू दूसरे से याचना करेगा? दूसरों की आज्ञा की प्रतीक्षा करेगा? दूसरों के भय से आतंकित रहेगा? यदि तुझमें क्षत्रिय का रक्त है तो तू ऐसा पराभूत अपमानित जीवन नहीं जी सकेगा। अपने वीरवंश में उत्पन्न है।

अपने वंश का कलंक बनकर शत्राु की कृपा का भिखारी बन कर जीवन बिताना तुझे शोभा नहीं देता। क्षत्रिय मर जाता है परंतु झुकता नहीं। बेटा अपने संजय नाम को व्यर्थ मत होने दे। तू प्रज्जवलित अग्नि की भांति प्रकाशित हो। निंदित अपमानित होकर, दीर्घ जीवन की इच्छा मत कर।’

माता विदुला की फटकार सुनकर, बड़े करुण स्वर में संजय ने माता से कहा, ‘‘माँ तू कितनी कठोर हैं। वीरता के आवेश में तू वात्सल्य को भूल गई हैं। प्राणों के भय से मैं तेरे पास आया हूँ। तू मुझे पुनः युद्ध में मत भेज! मेरे प्राणों की रक्षा कर।’’ विदुला ने कहा – मैं तेरी माता हूं। पुत्रा स्नेह माता का धर्म। पुत्रा का कल्याण हो यही माता की आंतरिक इच्छा होती है किंतु तुझे श्रीहीन, तेजोहीन देखकर भी मैं चुप रहूं तो मेरा मातृत्व लज्जित होगा। क्षत्राणी वीरमाता होने में गौरव मानती है। जो क्षत्रिय युद्ध में पीठ दिखाता है वह क्षत्रिय कहने योग्य नहीं है। धिक्कार है उस माता पर, व्यर्थ है उसका जीवन, जो ऐसे तेजोहीन, निरुघमी, कायर पुत्रा से स्नेह करके संतुष्ट रहती है।’

‘पुत्रा, तेरी यह अवस्था मोह के कारण हुई है। अपनी बुद्धि स्थिर कर, तभी तुझे अपना कर्तव्य क्या है, इसका स्मरण होगा। कर्महीन, उद्यमहीन, आलसी, संपन्न जीवन में कर्मवीर की यशरहित चेष्टायें सहस्त्रागुनी शलाघ्य है। प्राण जाने का भय त्याग दे’। ‘एक बार, अपने को क्षत्रिय माता के योग्य पुत्रा सिद्ध कर। अपने विरोधियों को अपने तेज और पराक्रम से रौंद डाल। वीरकुल में अपना जन्म सार्थक कर। तेरा साहस, तेरा शौर्य, तेरी वीरता सैनिकों में साहस और बल प्रगट करे। फिर देखना तेरी माता के हृदय में तेरे प्रति कितना स्नेह है।’
अंततः संजय तेजस्विनी का पुत्रा था। उसे माता के वचन चुभ गया। उसका वीरत्व जाग गया। उसने माँ के समक्ष प्रतिज्ञा की। ‘माँ तेरा पुत्रा या तो विजय होकर लौटेगा या तो वीरगति को प्राप्त करेगा।’ ऐसा कहकर उसने प्रस्थान किया। प्राणों को हथेली में लेकर लड़ने वालों के समक्ष यमराज भी नम्र होते हैं।

सिंधुराज को पराजित होकर भागना पड़ा और संजय ने विजयश्री को प्राप्त कर माता के चरणों पर मस्तक रखा। अपने प्राणों की बाजी लगाकर अपने आदर्शों की रक्षा करने हेतु अपने पुत्रों को रणभूमि में भेजने वाली विदुला का साहस वंदनीय है।

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