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भारतीय संस्कृति और योग – पुष्पम ए. कुमार

योग

भारतीय संस्कृति और योग – पुष्पम ए. कुमार

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प्रकृति की गोद में पली भारतीय संस्कृति हजारों वर्ष पुरानी है। इसे सनातन धर्म की देन कहा जाता है। यहां एक बात स्पष्ट कर लेनी चाहिए कि जिस प्रकार धर्म शब्द का अर्थ विश्व के अन्य धर्मों के लिए रूढ़ हो चुका है, वह सनातन धर्म के साथ लागू नहीं होता है। अधिकांश धर्मों का प्रतिपादन किसी एक व्यक्ति के विचारों, मतों और सिद्धांतों के आधार पर हुआ है, किंतु सनातन धर्म किसी एक व्यक्ति के विचारों या विश्वासों पर आश्रित नहीं है। असंख्य ऋषियों, मुनियों, विचारकों के विचार, अनुभव और ज्ञान सनातन धर्म के आधार रहे हैं। इस आधार पर यदि भारतीय संस्कृति को सनातन संस्कृति कहा जाए तो इसे अधिकथन नहीं नहीं माना जाना चाहिए।

सनातन संस्कृति निरंतर आध्यात्मिकता के अमृत से सिंचित और परिपोषित होती रही है। इसके वैदिक एवं वेदांतिक दर्शनों के साथ ही पैछा हुआ- योग। योग के विषय में अज्ञान के कारण लोगों के बीच अनेक प्रकार की भ्रांतियां फैली हुई हैं। कुछ लोगों के लिए योग केवल शारीरिक व्यायाम है तो कुछ लोग इसे जादू-टोना मानते हैं और कुछ तो इसे संसार से पलायन का मार्ग भी कहते हैं, जबकि योग मनुष्य के शरीर के साथ-साथ उसका मानसिक, भावनात्मक और आध्यात्मिक विकास भी करता है आधुनिकता की दौड़ ने मानव जीवन को विषमताओं से भर दिया है, अशांत कर दिया हैं मनुष्य जीवन की भौतिकताओं में, भावनाओं और तनावों में इतना डूब गया है कि अपनी मूल प्रकृति से उसका संबंध टूट गया हैं ऐसे में योग उसकी सहायता कर सकता है।

वस्तुतः योग जीवन की एक ऐसी पद्धति है जो व्यक्ति के व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास करती हैं योग उसके व्यक्तित्व के आंतरिक और बाह्य, दोनों पक्षों के बीच सामंजस्य स्थापित करने का प्रयास करता है। उसे उसकी अंतर्तम प्रकृति से जोड़ता है। गीता में कर्म की कुशलता को योग कहा गया है। योग सूत्रों के अनुसार चित्त की वृत्तियों को नियंत्रित रखना ही योग है। आत्मसंयम को भी योग कह सकते हैं। यह संयम शारीरिक, भावनात्मक, विचारात्मक, बौद्धिक एवं आध्यात्मिक होता हैं विभिन्न यौगिक क्रियाओं के द्वारा स्वयं को संयमित रखने पर या अपनी प्रवृत्तियों को नियंत्रित रखने पर मानसिक सजगता का विकास होता है।

अपने मन एवं मानसिक धारणाओं के प्रति सजग रहकर मनुष्य अपने जीवन को अधिक संतुलित, समन्वित और पूर्ण बना सकता है, उसके जीवन में अनेक प्रकार के सकारात्मक परिवर्तन आने लगते हैं। अतः योग को अपने जीवन का अभिन्न अंग बना लेना ही श्रेयस्कर है, जिसको प्राचीन भारतीय संस्कृति के साथ-साथ विश्व की प्राचीनतम सभ्यताओं में भी एक विशेष स्थान प्राप्त है।

पिछले कई दशकों में अनेक मनीषियों ने मानव के विकासात्मक संदर्भ में योग के महत्व के मूल्यांकन का प्रयास किया है प्रकृति में निहित चेतना ने विकास क्रम में प्रस्तर को वनस्पति, वनस्पति को पशु और पशु को मनुष्य में रूपांतरित किया है, चूंकि मनुष्य इस क्रम की अद्यतन कड़ी है, इसलिए वह स्वयं को विकास की पराकाष्ठा समझने की भूल कर बैठा है, जबकि उसकी भौतिक प्रकृति में पशुता अब भी विद्यमान है। हां, इन दोनों में एक अंतर अवश्य है, मनुष्य विचार एवं वाणीसम्पन्न हो गया है। या यूं कहें कि मनुष्य विचारवान और वाणीयुक्त पशु है विकास के इस क्रम को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि प्रकृति अपनी इन उपलब्धियों से कभी संतुष्ट नहीं होती और उसका विकासोन्मुख परिवर्तन क्रम निरंतन चलता रहता है।


मनुष्य संक्रमण की स्थिति में है। उसके अंदर विकसित चेतन शक्ति अब भी भौतिक सीमाओं में बंधी हुई है। इन सीमाओं को लांघकर संक्रमण के घेरे से परे जाकर मनुष्य को अपनी चेतना का विस्तार करना है रोग-शोक, राग-द्वेष, दुख-भय जैसी नकारात्मक प्रवृत्तियों से मुक्त होकर सत्य, शिव एवं सुंदर जैसे उदात्त भावों से चित्त और चेतना को परिष्कृत करना है। परिष्कृत हुई चेतना का उच्चतर चेतना में रूपांतरण का क्रम निरंतर चलता रहता है।

संक्रमण की स्थिति में मनुष्य एक नई दिशा पाने के लिए व्याकुल है। भौतिक और सामाजिक सिद्धांत दिशा प्रदान करने में असमर्थ हो चुके हैं। ऐसी स्थिति में योग का पुनरार्वतन आधुनिक मानव को प्रभावित कर रहा है जगत के क्षितिज पर योग आशा का सूर्य बनकर चमक रहा है। आधुनिक युग में महर्षि अरविंद ने योग की जिस धारा को जन्म दिया, उसका उद्देश्य है पृथ्वी पर अतिमानसिक चेतना को स्थापित करना। वह योग मात्रा व्यक्तिगत सिद्धि के निमित्त नहीं है, बल्कि संपूर्ण मानव समाज को अतिमानसिक की उस ऊंचाई तक ले जाने वाला है जहां मानव प्रकृति दिव्यता में रूपांतरित हो सकती है।

परमहंस सत्यानंद ने आर्ष वचनों में व्यक्त किया है कि योग आने वाले युग में एक शक्तिशाली संस्कृति के रूप मंे प्रकट होने वाला है। यह आधुनिक संस्कृति के रूप को और अधिक उपयोग और सारपूर्ण बनाते हुए उसके विकास में सहायक होगा।
तब मनुष्य स्वयं को अतिमानसिक चेतना और सत्य, शिव और सुंदर के बोध से विस्तीर्ण हुई सजगता के निस्सीम साम्राज्य में स्थित पाएगा।

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