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कप्तान – शिवरानी देवी प्रेमचंद

कहानी

कप्तान – शिवरानी देवी प्रेमचंद

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प्रेमचंद की धर्मपत्नी शिवरानी देवी की यह प्रेरास्पद कहानी वीरांगना सुभद्रा की वीरता और साहस का चित्राण कर रही है।
दोनों भाई दूसरे रोज वापस गये।

इन लोगों केा गये तीन महीने भी नहीं होने पाये थे कि बर्मा में जापानियों के गोले गिरने लगे। लड़ाई के पहले ही मोर्चे पर जाने वाली फौज में पहले बलवान गया। लड़ाई के वक्त सिपाही जो गिरते हैं उनमें जिनके जिन्दा रहने की कुछ आशा है, उन्हें तो उठा करके ले जाते हैं, जिनको समझते हैं कि ये महीने दो महीने लेंगे उनको घोड़ों से और टापों से रौंद देते हैं।
बलवानसिंह गिरता है। ठीक निशाना लगता है। जोरावर दूर खड़ा है। दूर है, मगर जैसे ही उसे बलवान के गिरने का मालूम होता है, वैसे ही जोरावर बलवान की लाश के लिए लपकता है और उठाए हुए भागता है, कंधे पर लादकर। इधर देखता है न उधर देखता है। भागता है दरिया की तरफ, जिसे कि पार करके उसे जाना है। रात का समय।
माझी पूछता है- तू कौन है !
जोरावर- मैं हूँ कप्तान।
– क्या तुम फौज से भाग रहे हो ? क्या मौत के डर से भाग रहे हो ! रात को पार करने का सरकारी हुक्म नहीं है।
जोरावर- मैं भाग नहीं रहा, माँझी। मेरी माँ की अमानत मेरा भाई था। वह लड़ाई में काम आया। उसी की लाश देने जा रहा हूँ। माझी- सरकारी हुक्म लाओ। तुमको एकाएक करके यहाँ हुक्म नहीं है भागने का। जोरावर- मैं भाग नहीं रहा। मुझे सिर्फ इसकी लाश को पहुँचा आना है।

माझी- जो अमानत थी, वह थी। लाश थोड़े ही अमानत है। लाश को लेकर तुम्हारी माँ क्या करेगी! ये जितने मरनेवाले मर रहे हैं, ये सभी तो अमानतें हैं। सभी तो माँ से पैदा होते हैं। बगैर माँ के कोई है! माताओं ने तो दे दिया, बेच दिया- चाँदी के टुकड़ों पर और कागज के चिन्हों पर। आज तुम लाश लिये जा रहे। कल तुम्हारी यही हालत हुई तो तुम्हारी लाश क्या मैं पहुँचाने जाऊँगा ?
जोरावर- कुछ नहीं, मैं तुमसे आज आरजू करता हूँ। मैं कल सुबह आ जाऊँगा। मैं कभी आरजू नहीं करता। सिफ माँ की इस अमानत के लिए आरजू कर रहा हूँ। क्या तुम मेरी इतनी आरजू नहीं सुनोगे ?
माझी- वादा करते हो, कल सुबह आ जाओगे ? जोरावर- हाँ, वादा करता हूँ मैं कल आ जाऊँगा।
–जाओ। चलो मैं किश्ती खोले देता हूँ। माझी किश्ती खोलता है। पार उतारता है । जोरावर लाश लिए हुए 8 बजे दिन घर पहुँचा। माँ के सामने रख के- माँ यह तुम्हारी अमानत है।
माँ को उस समय रोना नहीं आया। बोली- एक दिन, बेटे, सबकी माओं की अमानतें वापिस आयेंगी। यह अमानत कहाँ। बलवान था, वीरगति पाई !

कहकर तो आया था जोरावर, कि मैं सुबह आ जाऊँगा मगर घर आने पर उसकी इच्छा नहीं हुई जाने की।
सुभद्रा से बोला- क्या करूं, मैं अपने वचन से झूठा बना। मुझे नरक मिले, स्वर्ग मैं नहीं चाहता। मैं तुम्हें छोड़कर नहीं जा सकता हूँ। मगर हाँ एक मजबूरी है। मैं घर पर रहने नहीं पाऊँगा । आज तुम्हारे वह शब्द मेरे कान में गूँज रहे हैं जो तुमने कहे थे, कि सिपाही और कप्तान के लिये–या तो विजय या मौत ! इस लड़ाई की हालत देखकर, विजय तो हमको क्या मिलेगी — शायद मौत ही मिले।सुभद्रा-विजय! विजय बड़ी मूल्यवान चीज है। अब यह देखना है कि उसका सेहरा किसके माथे पर बँधता है– मेरे या आपके माथे। यह आप क्यों सोचते हैं कि विजय का सेहरा आप ही लोगों के सर पर चढ़ेगा। अगर तुम मेरे प्रेम में पड़ करके छिपना चाहते हो –तो चलो, बहादुर की मौत तुम भी मरना, मैं भी मरूं !

ये शब्द सुभद्रा के, माँ के भी कान में पड़े – ‘मैं तुम्हारे साथ चलू !’

माँ–अरे बेटा, यह कायरों का काम है । आज यहाँ तू सरकारी नौकर है तो यह काम कर रहा है। कल दुश्मन चढ़ आये तो क्या हमारी लोगों की इज्जत बाकी रह जायेगी ? आज तो एक सरकार है सर पर। उसके रुपये देने से तुम सब काम करने गये। अगर हमारी सरकार होती तो तुम सब के सब बगैर रुपये के, बगैर सहारे के, अपने-अपने घर से निकलते। और कोई समय आयेगा जब तुम अपने-अपने घर से निकलोगे । छिपने का नाम भी सुनके मुझे हँसी मालूम होती है।

जोरावर–माँ, कैसी बात करती हो! एक की लाश देखकर के भी तुम्हें अभी तस्कीन नहीं हुई। वहाँ, माँ, लाशों को तुम देखो तो पता चले। वहाँ लाशों से बच के निकलना मुश्किल है।
माँ–मैं…, खैर, यह लड़ाई तो मैंने देख ली। मगर कहो तो मैं चलूं । मैं और बहू दोनों चलें। ये शैतान जर्मनी और जापान अगर मुल्क में आ जायेंगे, तुम समझते हो, तुम्हारी
बहू-बेटियों की खैरियत है! उस वक्त तुम्हें जो तकलीफ होगी अपनी हालत देखकर और हम लोगों की दुर्दशा– तो क्या उससे भी मौत मुश्किल है ? फिर मैं तुम्हें आज अपने आँचल के नीचे, गोदी के नीचे, छिपा लूँ? वह माताओं के लाल नहीं हैं ?’
माँ की फटकार से और सुभद्रा की लताड़ से जोरावर के बल आया।
सुभद्रा नहीं मानी, साथ में गई। दोनों साथ-साथ चले जाते हैं, गुम-सुम, न कोई किसी से बोलता है न चालता है। जैसे अपरिचित हों कोई। जब दरिया के किनारे पहुँचे, माझी ने पूछा–कप्तान साहब, आप आ गये! उस समय जोरावर के दिल में महान् शक्ति आई । जैसे सोये से कोई जागा हो। माझी–यह तुम्हारे साथ स्त्राी कौन है ? जोरावर- यह मेरी स्त्राी है। –यह गुलाब का ऐसा फूल क्यों लाये ? यहाँ तो नर-संहार है।
सुभद्रा–नर-संहार है तो क्या यहाँ कोई घबरानेवाला है। फूल अगर फूला है तो कुम्हलाने ही के लिए तो है। आदमी ने अगर जन्म लिया है तो मरने ही के लिए तो। कुत्तों की मौत से बहादुरों की तरह मरना फिर भी अच्छा है।
इतना कहते हुए सुभद्रा मुस्करा उठी । सुभद्रा की उस हँसी में व्यंगय की हँसी नहीं थी, बल्कि कर्तव्य की हँसी थीय—‘शायद मैं भी कुछ करके जाऊँ।’ जब पार आये, कप्तान अपने खेमे में गया। सुभद्रा साथ में। जब वह मैदान में गया, जोरावर सिंह–सुभद्रा भी उसी के कपड़े पहनकर उसके पीछे साथ में गई । चार रोज तक, जब जाता था तब वह साथ में रहती थी। पाँचवे रोज जोरावर सिंह की बारी थी, सुभद्रा ने गिरते देखा। सुभद्रा ने झुककर लाश उठाई। अपने खेमे में ले जाकर वहाँ उसे चूमा। लाश थी निर्जीव। उस समय उसके मुंह से निकला–हाँ, तुम विजयी हो! तुमने वादा पूरा किया । अभी थोड़ी देर में मेरी भी तो यही हालत होगी। उसी माझी के पास गई ।
— माझी! यह मेरी लाश है। पता देती हूँ। माँजी को दे आओ! उनकी अमानत थी।

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