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कर्नाटक में कांग्रेस ने क्या पाया ?

आवरण कथा

कर्नाटक में कांग्रेस ने क्या पाया ?

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कनार्टक के राजनीतिक नाटक का पटाक्षेप हो चुका है। जनता दल सेकुलर और कांग्रेस ने मिलकर सरकार का गठन कर लिया है। सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी हो कर भी मात्रा 8 सीटों से बहुमत से दूर भारतीय जनता पार्टी सदन में विश्वास मत में पराजित हो जाने से पहले ही मुख्य-मंत्राी के इस्तीफे के बाद विपक्ष में बैठने को विवश है। कर्नाटक की जनता इस अनैतिक और अस्वाभाविक गठबंधन से आहत तो है ही, जिस तरह भारतीय जनता पार्टी को सरकार के गठन से दूर किया गया है उससे भी जनमानस में असंतोष व्याप्त है।

किंतु इससारे राजनीतिक नाटक में एक सवाल पैदा हो गया है कि दो तीन राज्यों तक सिमटी कांग्रेस ने इस से क्या हासिल किया? जिस राज्य में कुछ दिन पहले ही वह बहुमत के साथ सत्तासीन थी, आज वहां मात्रा 38 सीट लाने वाले कुमार स्वामी के समक्ष समर्पण करते हुए कांग्रेस संयुक्त सरकार में अपने गिने-चुने मंत्रियों के साथ एक बार फिर सत्ता में तो आ गई है, किंतु न तो उसके पास वह शक्ति है और ना ही उतना मनोबल। कांग्रेस की यह दुर्दशा बिलकुल वैसी ही है जैसे वर्ष 2013 में दिल्ली में अरविंद केजरीवाल के साथ सरकार बनाते समय हुई थी। उस समय केजरीवाल ने शीला दीक्षित को 25884 मतों से पराजित कर दिल्ली में कांग्रेस का विकल्प बन कर दिखा दिया था। लेकिन सत्ता बनाए रखने की जिद के चलते कांग्रेस ने वहां भी एक अनैतिक गठबंधन किया, जो 14 फरवरी 2014 को समाप्त हो गया। 28 सीट जीतने वाली आम आदमी पार्टी ने अपनी शहादत को अच्छी तरह भुना लिया। लेकिन कांग्रेस भारतीय जनता पार्टी को सत्ता से दूर रखने के फेर में खुद नष्ट हो गई।

फरवरी 2015 में जब चुनाव हुए उस समय दिल्ली की 70 में से 67 सीटों पर कांग्रेस तीसरे और चैथे नंबर पर थी। दिल्ली में कांग्रेस का वजूद खत्म हो चुका था। यद्यपि करारी हार तो भारतीय जनता पार्टी की भी हुई थी जिसे मात्रा तीन सीटें मिली, लेकिन कांग्रेस ने अपने आपको मिटा कर जिस तरह भारतीय जनता पार्टी को सत्ता से दूर रखा वह एक अविस्मरणीय इतिहास बन गया। भारतीय राजनीति में ऐसा उदाहरण बिरला ही मिलेगा जब एक पार्टी ने दूसरी पार्टी को दूर रखने के लिए खुद को नष्ट कर लिया।

आज कर्नाटक में भी इतिहास दोहराया जा रहा है। जिस जनता दल सेकुलर से कांग्रेस में हाथ मिलाया है उसका इतिहास भी धोखा और सत्ता लोलुपता से भरा पड़ा है। इतिहास तो कांग्रेस का भी वैसा ही है। देवेगौड़ा को कांग्रेस ने धोखा दिया था और सीताराम केसरी ने उन्हें अपदस्थ कर दिया था, वह ज्यादा नहीं दो दशक पुरानी ही घटना है। इस बीच जनता दल ने भी कांग्रेस को धोखा देकर हिसाब बराबर कर लिया,  बल्कि जनता दल ने तो भारतीय जनता पार्टी को भी धोखा दिया था। दोनों दलों की राजनीतिक बुनियाद में धोखा और सत्ता लोलुपता कूट-कूट कर भरी हुई है।

इसीलिए जब 15 मई को दोपहर एक बजे यह सुनिश्चित हो गया कि भारतीय जनता पार्टी पूर्ण बहुमत से दूर है, अचानक दोनों दल एक दूसरे के करीब आ गए। पहल कांग्रेस ने की और कहा कि वह बिना शर्त समर्थन देने के लिए तैयार है।

कांग्रेस के इस कदम से कर्नाटक का मतदाता और देश का जनमानस स्तब्ध हो गया। किसी को यह विश्वास ही नहीं हो रहा था कि चुनाव के दौरान जिस जनता दल सेकुलर ने कांग्रेस के खिलाफ आक्रामक प्रचार किया और जिस तरह कांग्रेस ने जनता दल सेकुलर को पानी पी-पीकर कोसा वे दोनों दल अचानक सत्ता के लिए सब कुछ भुला कर एक हो जाएंगे। कांग्रेस के पराभव की यह पराकाष्ठा ही कही जा सकती है। लेकिन इसके पीछे एक जिद भी है। वह जिद है साम-दाम-दंड-भेद अपनाकर भारतीय जनता पार्टी को सत्ता से दूर रखना। अपनी इस जिद के चलते कांग्रेस ने दिल्ली या कर्नाटक ही नहीं देश के अनेक राज्यों में अपनी मिट्टी पलीद कर ली है। आज कांग्रेस किसी क्षेत्राीय पार्टी से भी कम छोटे से क्षेत्रा में सिमट गई है। देश की ढाई प्रतिशत आबादी पर भी उसका वर्चस्व नहीं है।

कर्नाटक, पंजाब और पुडुचेरी के अलावा पूर्वोत्तर के एक राज्य में बमुश्किल कांग्रेस की सत्ता है और वहां से भी मैं सिमटने लगी है। ऐसी स्थिति में कांग्रेस को आत्ममंथन करना था। अपनी लोकप्रियता पुनः हासिल करने का प्रयास करना था। लेकिन कांग्रेस ने अपनी सारी ऊर्जा भारतीय जनता पार्टी को रोकने में लगा दी। आज कांग्रेस के पास देश की जनता के समक्ष प्रस्तुत करने के लिए ना तो कोई कार्य योजना है और ना ही कोई लोकप्रिय चुनावी कार्यक्रम। उसका एक ही लक्ष्य है। भाजपा को सत्ता से दूर रखना। अपने इस लक्ष्य की प्राप्ति में वह सोचने समझने का विवेक मानो खो चुकी है। कभी देश की सत्ता पर एकछत्रा राज करने वाली कांग्रेस क्षेत्राीय दलों के चरणों में लोट रही है। उत्तर प्रदेश में वह समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के बीच छोटे से हिस्से के लिए अपना सब कुछ बलिदान कर चुकी है। बिहार में राष्ट्रीय जनता दल जैसे दलों के समक्ष उसकी हैसियत शून्य है। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की ममता की वह मोहताज है। राजस्थान, मध्यप्रदेश, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में वह प्रमुख विपक्षी दल अवश्य है। लेकिन उस की करतूतें शीघ्र ही उसे तीसरे नंबर पर ला पटक सकती हैं। पूर्वोत्तर में तो उस का सफाया हो चुका है।

बीजू जनता दल कांग्रेस को वैसे भी घास नहीं डालता है। क्षेत्राीय पार्टियां कांग्रेस की मालिक बन बैठी है और कांग्रेस उन के रहमों करम पर सत्ता के ख्वाब देख रही है। जब कर्नाटक में चुनाव प्रचार के दौरान राहुल गांधी ने कहा था कि वह प्रधानमंत्राी बनने को तैयार हैं तो उनके इस कथन का सोशल मीडिया पर जमकर मजाक उड़ाया गया। राहुल गांधी के इस कथन में गलत कुछ नहीं है, देश के हर राजनेता को प्रधानमंत्राी बनने का ख्वाब देखने का हक है। लेकिन राहुल गांधी प्रधानमंत्राी बनने के लिए सीटें कहां से लाएंगे? एक भी राज्य तो ऐसा नहीं है जहां वह अपने दम पर चुनाव लड़ सके। लगभग सभी राज्यों में क्षेत्रीय दलों की तरफ हाथ जोड़कर खड़ा होना पड़ रहा है। समझौते करने पड़ रहे हैं। सीटों के तालमेल में अपने ही लोगों का हक मारना पड़ रहा है। इस बुरी स्थिति में कांग्रेस का अध्यक्ष प्रधानमंत्राी बनने का ख्वाब देखता है तो सोशल मीडिया पर उसका मजाक बनना स्वाभाविक है। कांग्रेस को यह नहीं भूलना चाहिए कि जिस तरह कर्नाटक में महज 38 सीटें जीतने वाले को समर्थन देना उसकी विवशता बन चुकी है वैसे ही विवशता बार-बार अनेक राज्यों में बनेगी। केंद्र की सत्ता का स्वप्न तो बहुत दूर है।

जिस तरह राहुल गांधी दिन में सपने देख रहे हैं वैसे ही ममता बनर्जी, अखिलेश यादव, मायावती, चंद्रबाबू नायडू और वयोवृद्ध हो चुके देवेगौड़ा इत्यादि भी है। जिस विपक्ष को एक करने की महत्वाकांक्षा कांग्रेस की है उस विपक्ष में अनेकों की महत्वाकांक्षा प्रधानमंत्राी बनने की है। ऐसे में भानुमति का कुनबा आपस में लड़ मरेगा या फिर मजबूत भारतीय जनता पार्टी से मुकाबला करेगा यह एक बड़ा सवाल है।

 

 

 

 

 

 

कर्नाटक में कांग्रेस का भविष्य तय हो गया है। अगली बार चुनाव के समय कांग्रेस तीसरे नंबर पर ही दिखाई देगी। ठीक वैसे ही जैसे दिल्ली में हुआ था। कांग्रेस को इतिहास से सबक लेने की आदत नहीं है। लेकिन जो भी कांग्रेस के शुभचिंतक हैं, लगातार नीचे जाती कांग्रेस की स्थिति पर दुख मना रहे हैं। उनके दुखी होने के अनेक कारण हैं। भविष्य में कोई ऐसा संकेत भी नहीं है कि उन्हें सुखद समाचार मिलेगा। एक ही परिवार से अध्यक्ष और प्रधानमंत्राी पद के दावेदार की मजबूरी कांग्रेस को रसातल में धकेल रही है। लगातार चुनाव हार हार कर ‘सर्वहारा’ बने राहुल गांधी की तरफदारी और कितनी की जा सकेगी? कहीं ऐसे में कांग्रेस ही दो  ना हो जाए। कांग्रेस को आत्म चिंतन की आवश्यकता है। लेकिन आत्म चिंतन करने का समय कांग्रेस के पास कहां है, वह तो राहुल गांधी की चाटुकारिता और सत्ता के चिंतन में मगन है।

 

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