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अध्यादेश लाएं राम मंदिर बनाएं

मेरी दृष्टि

अध्यादेश लाएं राम मंदिर बनाएं

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कर्नाटक चुनाव प्रचार के दौरान टीवी देखते हुए चैनल बदल रही थी। गरमा-गरम अंतहीन और अर्थहीन बहसें जारी थीं। देखा कांग्रेस के पक्ष के प्रवक्ता सवाल खड़े कर रहे थे,‘ ‘भाजपा ने राम मंदिर निर्माण के लिए अब तक क्या किया। वे मंदिर निर्माण क्यों नहीं कर रहे?’ मैं आश्चर्यचकित और भौचक थी! यह तो ऐसी ब्रेकिंग न्यूज थी कि राम मंदिर निर्माण के पक्षधरों का हृदय खुशी से ब्रेक ही हो जाए। भाजपा से बेशर्मी से भरे सवाल पूछने वाले क्या यह वही संवेदनहीन चेहरे थे जिन पर 7 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद विध्वंस से कालिख पुत गई थी? दूसरे चैनल पर राहुल गांधी का धर्मनिरपेक्ष सिर किसी मंदिर में  माथा टेकते हुआ दिखा। राहुल गांधी हिंदुओं के भगवान से कांग्रेस की डूब गयी नैया को ऊपर लाने की प्रार्थना कर रहे थे। तीसरे चैनल पर और अधिक रोचक दृश्य था। 30 सितंबर 1990 को, निहत्थे कारसेवकों को अयोध्या की संकरी गलियों को जलियांवाला बाग बनाकर नृशंस नरसंहार करने वाले, मौलाना मुलायम सिंह यादव का चेहरा, राम मंदिर निर्माण के पक्ष में मुलायम हो रहा था। अन्य चैनल पर ममता दीदी का ममताहीन, भावहीन सपाट चेहरा भी, राम मंदिर निर्माण के पक्ष में बात करता नजर आया।

हृदय परिवर्तन की बयार अचानक क्यों और कैसे बहने लगी है? यह जानने का हक इस देश के राम भक्तों को है। क्योंकि राम भक्तों के सीने पर कटार चलने लगी है। देश के बहुसंख्यक वर्ग की आंखों के सामने इतने  वर्षों में अपने ही देश में बेगाने कर दिए गए कश्मीरी पंडितों के चेहरे झूलने लगे हैं। क्या इस तथाकथित कश्मीरी पंडित के नवासें को उन पंडितों की याद भी ऐसे ही आएगी?

अयोध्या में भाटी नरेश महताब सिंह और उनके सेनापति पंडित देवीदीन पांडे की शहादतों की गवाह, एक लाख 74 हजार हिंदुओं की लाशों पर बनी बाबरी मस्जिद, क्षमाशील भारत के सहिष्णु और उदार हिंदुओं के सीने में गड़ी थी। देश के कोटि-कोटि हिंदुओं को सदियों से अपमानित करता हुआ यह विवादास्पद ढांचा, जिसे 1526 में तथाकथित संत मूसा आशिकान के कहने पर मीरबाकी ने निर्मित कराया था, राम भक्तों की आंखों में शूल चुभता था। अपने समय के भव्य, उन्नत स्वर्ण शिखरों वाले कसौटी स्तंभों से युक्त ‘विष्णुहरि राम’ के जन्म भूमि मंदिर को जमींदोज करके बनाई गई इस मनहूस इमारत की अशुभ मीनारों में, 1526 से 6 दिसंबर 1992 तक 77 युद्धों के रक्तरंजित संघर्षपूर्ण इतिहास की करुण गाथाएँ छुपी हुई थी।

आज जब इस ‘राम जन्मस्थान’ पर परिस्थितियों से लाचार और बेनकाब चेहरे, राममंदिर निर्माण की बात कर रहे हैं तो अचंभा होता है। 30 सितंबर 2010 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने वर्षों से चलते प्रकरण में पहली बार ऐतिहासिक अन्याय को ऐतिहासिक न्याय में बदलते हुए, राम जन्मभूमि मंदिर के अस्तित्व को स्वीकारते हुए निर्णय दिया था। 6 दिसंबर 1992 की घटना के भी 18 वर्षों पश्चात् आशा थी कि 464 वर्षांे के संघर्ष को विराम मिलेगा और राम जन्मभूमि को प्राप्त करने की हिंदुओं की वर्षों से संचित अभिलाषा पूरी होगी। तमाम आँधी-तूफानों में भी अबुझ रही चिंगारी प्रज्जवलित होगी। अपमान से झुके सर स्वाभिमान से ऊपर उठेंगे। आठ सदियों के अत्याचारों और अनाचारों से आहत हिंदु हृदयों को सांत्वना मिलेगी। तलवार की नांेक पर किए गए धर्म परिवर्तनों का जवाब दिया जा सकेगा। किंतु न्याय के नाम पर देरी और केवल देरी। अल्पसंख्यक हितों की आड़ में समानता के स्थान पर बहुसंख्यकों के साथ सौतेला व्यवहार। हिंदू सहनशीलता के नाम पर कायराना प्रदर्शन। संविधान के प्रदत्त मौलिक अधिकारों का केवल अल्पसंख्यकों के हित में मुखर और बेशर्म प्रयोग। आहत हिंदू चेतना को जैसे ही अवसर मिला और तारणहार नजर आया तो वह सर उठा कर खड़ी हो गई और मई 2014 में उखाड़ फेंका उन सारी अंधे सत्ता के मद से चूर मदहोश शैतानी ताकतों को।

तम और प्रकाश के इस संघर्ष में परास्त  हुई राजनीतिक शक्तियाँ अब चेती हैं। जिस प्रकार मुस्लिम वोट को जेब में रखे रहने के लिए हिंदू वोट जेब में ही मान कर चलने वालों ने हिंदू समाज की अवहेलना, उपेक्षा और तिरस्कार किया है, उसके परिणाम जब दिखने लगे हैं तो वक्त आ गया है जब देश की संसद में अध्यादेश लाकर राम मंदिर निर्माण कराया जाए। की जाए देश की संसद में अध्यादेश पर बहस। पूछा जाए राम के अस्तित्व को तीन तलाक प्रथा के समकक्ष रखने वाले कपिल सिब्बल से, उन्हें क्या कहना है? स्पष्ट हो जाए ‘मेरे रहते अयोध्या में चिड़िया भी पंख नहीं मार सकती’ की सीना ठोक घोषणा करने वाले मौलाना मुलायम सिंह यादव के राम मंदिर निर्माण पर विचार। जान जाए देश पश्चिम बंगाल में भाजपा के पंचायत चुनाव में थोड़ी सी पंचायतों में जीतने पर भी हिंसा का तांडव नृत्य करवाने वाली ममताहीन ममता बनर्जी के असमय उमड़े हिंदू प्रेम के कारण गीता बाँटने का राज। पता हो जाए देश को उन तथाकथित रंग बदलते हुए गिरगिटी धर्मनिरपेक्षता वादी दलों की राम मंदिर निर्माण की योजनाएँ। समझ जाएं भारत के मुसलमान भी उनके मुख से अंतिम सत्य कि राम जन्मस्थान पर राम मंदिर निर्माण ही होगा मस्जिद नहीं। कहें वे ही जो मुसलमानों के हितैषी होने का दावा करते हुए उन्हें दशकों से मूर्ख बना रहे हैं। हम भी तो सुनें आंध्र प्रदेश के पिछले चुनाव में हाथ में बाइबल रखकर प्रचार करने वाले जगनमोहन रेड्डी के समान मुसलमान दादी इंदिरा गांधी के पोते और ईसाई सोनिया गांधी के पुत्रा के इस अचानक उमड़े राम प्रेम के पीछे की कड़ी सच्चाई क्या है? चरखी दादरी पर विलाप करने वाली और बाटला हाउस एनकाउंटर पर आहें भरने वाली और बाबरी विध्वंस पर क्षमा याचना करने वाली कांग्रेस ने यकायक हिंदुत्व का चोला क्यों पहन लिया है? सत्ता से दूर होती जा रही, देश के प्रत्येक राज्य से विलुप्त होती जा रही और कांग्रेस मुक्त भारत के मोदी जी के स्वप्न को साकार कर रही कांग्रेस के कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसे राजनेताओं को यूँ ही विघ्नविनाशक गणेश क्यांे याद आने लगे हैं। उनके धार्मिक एहसासों में आमूल-चूल परिवर्तन के पीछे छिपी आस्था की अधार्मिक असलियत क्या है? देश के सनातन हिंदू भी, कल तक मस्जिद-मस्जिद भटकने वाले और आज मंदिरों की दहलीजों पर सिर रगड़ने वालों के मंदिर प्रेम के छलावे को जानने को आतुर हैं। वे हृदयहीन चैखटों पर सनातनी हिंदू की फोटो जड़ने वालों का मुखौटा चढ़ाने वाले दलों से, हिंदु हितों पर उनकी नीति और योजनाएं समझने को उत्सुक हैं।

आश्चर्यजनक है यह बदलाव, रंगे सियारों के इस असमय हृदय परिवर्तन के पीछे काली कुंठित मानसिकता क्या देश नहीं समझता? 2014 में इनके चेहरों से नकाब को देश की सेवा में समर्पित हाथों  ने खींच लिया था और खूनी पंजों की उंगलियाँ तोड़ दी थी। तब चर्च जाने वालों और अब तिरुपति के मंदिर में दिखने वालों से देश राम मंदिर निर्माण के प्रयासों के बारे में जानना चाहता है। ‘उल्टा चोर कोतवाल को डांटे’ की तर्ज पर उनके उल्टे सवाल नहीं सुनना चाहता। अयोध्या में सौहार्द्र, समन्वय और सद्भावना के नाम पर राम मंदिर के साथ-साथ मस्जिद निर्माण की बात करने वालों से भी, हिंदू समाज सदियों झेली गई पीड़ा का हिसाब पूछना चाहता है।

कौन दे सकेगा दे, जवाब चाहिए,

रक्त की बूंद-बूंद का हिसाब चाहिए…

किंतु लुटेरे मुस्लिम आक्रमणकारियों और क्रूर एहसानफरामोश अंग्रेज व्यापारियों का आज तक महिमामंडन करते आ रहे, इन स्वार्थी राजनीतिक दलों के पास कहने को भी क्या है?

हमें इसमें कोई हैरानी नहीं है, क्योंकि, किसी की आंख में शर्म तो किसी की आंख में पानी नहीं है।

समय आ गया है कि हिंदुओं के समर्थन से केंद्र में सत्तासीन भारतीय जनता पार्टी की सरकार, राम मंदिर पर अध्यादेश लाकर हिंदुओं के बहते नासूर पर सांत्वना का फाहा रखे। जो न्यायपालिका नहीं कर पा रही वह कार्यपालिका करे और राम के भव्य मंदिर निर्माण का अपना संकल्प पूरा करे। अपने दृढ़ निश्चय का प्रदर्शन करते हुए ‘विष्णुहरि’ के मंदिर का निर्माण उसी प्रकार करवाए जैसे 12 वीं शताब्दी में महाराजा अनयचंद्र के पुत्रा और सल्लक्षण के पौत्रा मेघसुत ने करवाया था। जो महाराजा अल्हण के भतीजे और विक्रमादित्य के समान शूरवीर राजा भोज के समान प्रतिभाशाली आयुषचंद्र के चचेरे भाई थे। जिसका उल्लेख उस 5 फीट चैड़े ढाई फीट ऊँचे पाषाण पर उत्कीर्ण 20 पंक्ति के शिलालेख में मिलता है। ऊंचे स्वर्ण शिखर पर सुशोभित और 64 से अधिक कसौटी पत्थर के अलंकृत पाषाण स्तंभों से युक्त अद्वितीय अनोखे राम मंदिर का निर्माण। न्याय के मंदिर न्याय कर सकेंगे या नहीं, पता नहीं। किंतु इस ऐतिहासिक न्याय की अपेक्षा इतिहास पुरुष नरश्रेष्ठ नरेंद्र मोदी से तो देश को है ही। वे अध्यादेश लाएँ और राममंदिर बनाएँ और कर सकें हिंदू समाज की वर्षों से संचित अभिलाषा पूरी, इसी भावना के साथ।

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