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‘इच्छा मृत्यु’ कितनी कारगर होगी ?

आवरण कथा

‘इच्छा मृत्यु’ कितनी कारगर होगी ?

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27 नवम्बर 1973 की वह शाम शायद ही किसी को याद हो, लगभग 45 वर्ष किसी घटना को बीत जाये तो स्वाभाविक है स्मृतियों पर धुंध पड़ जायेगी, संवेदनाओं में जाले लग जायेंगे और भावनाएं धूल-धुसरित हो चुकी होंगी। उस जहरीली शाम बलात्कार और शारीरिक हिंसा के अनंत पीड़ा में धकेल दी गई मुंबई के किंग्स एडवर्ड मेमोरियल हाॅस्पिटल की नर्स अरुणा रामचंद्रन शानबाग इसी संवेदनहीनता का दुष्परिणाम जीवनभर झेलती रहीं और मृत्यु की इच्छा होते हुए भी तड़पकर मरी क्योंकि उन्हें दया मृत्यु या इच्छा मृत्यु देने का प्रावधान नहीं था।

इच्छा को विधि सम्मत बनाने की पहल के बीच यह प्रश्न भी खड़ा हो गया है कि ऐसी घटनाओं में जालसाजी पर कैसे अंकुश लगाया जा सकेगा…?

अरुणा जैसी कई महिला-पुरूष हैं जिनकी कहानियां समाचारों में एक या दो काॅलम की खबर बनकर हमारी स्मृतियों से धुल जाती है। किन्तु यह करुण वाकया जीवित रहा पिंकी विरानी नामक पत्राकार और एक्टीविस्ट महिला के कारण। जो शायद यह जानती थी कि जिस शरीर को अरुणा की आत्मा दशकों से ढोने के लिए विवश है, उसमें जीवन के अवश्यम्भावी लक्षणों का विकास होना शायद आज के विज्ञान द्वारा संभव नहीं है। अरुणा उस खौफनाक हादसे मंे कोमा में चली गई थी, क्योंकि दरिंदे ने कुत्ते बांधने की चेन से अरूणा के गले सहित शरीर के दूसरे हिस्सों को बांधकर उनसे अप्राकृतिक कुकृत्य किया था। लोमहर्षक तथ्य यह है कि इस पाश्विक कृत्य को अंजाम देने वाले को सिर्फ सात वर्ष की सजा हुई। वह भी हत्या के प्रयास में। डाॅक्टरों ने बलात्कार की बात बीच में ही दबा दी। क्योंकि अरुणा की सगाई अस्पताल में की कार्यरत एक डाॅक्टर से हो चुकी थी और अस्पताल के उच्च अधिकारियों को भय था कि अप्राकृतिक कृत्य की शिकार अरुणा के भावी जीवन पर इस मुकदमे का असर पड़ सकता था।

ऐतिहासिक निर्णय

उच्च्तम न्यायालय ने मुंबई के एक अस्पताल में वर्षो से अचेत पड़ी अरुणा की इच्छामृत्यु को अमान्य कर दिया था। किन्तु एक ऐतिहासिक फैसला दिया जिसके तहत पैसवि यूथेनेशिया को स्वीकृति प्रदान की गई। पैसिव यूथेनेशिया का अर्थ है वैसे मरणासन्न मरीज जिनकी स्थिति में सुधार की कोई गुंजाइश न हो और सिर्फ जीवन रक्षक प्रणाली हटाने भी से उनकी मृत्यु हो जाये उन्हें जीवन रक्षक प्रणाली हटाकर इस जीवन से मुक्त करना। एक्टिव यूथेनेशिया में मरणासन्न मरीज को मृत्यु में प्रत्यक्ष सहयोग दिया जाता है। अर्थात् मारने के लिए अलग से दवा या इंजेक्शन देने की जरूरत पड़ती है।

अरुणा लगभग 5 दशक कोमा में रहने के बाद जीवन से मुक्त हो सकी। लेकिन उनकी जीवन यात्रा ने पिंकी वीरानी को दया मृत्यु और इच्छा मृत्यु की लड़ाई के लिए प्रेरित किया। आज सुप्रीम कोर्ट ने इच्छा मृत्यु को सहमति प्रदान कर दी है। किंतु दया मृत्यु पर अभी भी प्रश्नचिन्ह है। इच्छा मृत्यु की वसीयत की जा सकती है।

क्या है इच्छामृत्यु, कैसे मिलेगी?

सुप्रीम कोर्ट ने निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दे दी है। इसे पैसिव यूथेनेशिया भी कहा जाता है। अब वे मरीज, जो कभी ना ठीक हो पाने वाली बीमारी से पीड़ित हैं और घोर पीड़ा में जीवन काट रहे हैं। उन्हें सम्मान के साथ अपना जीवन खत्म करने की अनुमति दे दी गई है। लेकिन क्या कोई भी इच्छामृत्यु पा सकता है?

सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस आॅफ इंडिया दीपक मिश्रा की अगुवाई वाली पांच जजों की संवैधानिक बेंच ने ‘निष्क्रिय इच्छामृत्यु’ और ‘लिविंग विल’ को कुछ शर्तों के साथ अनुमति दे दी है। कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा कि मरणासन्न व्यक्ति को यह अधिकार होगा कि कब वह आखिरी सांस ले। कोर्ट ने कहा कि लोगों को सम्मान से मरने का पूरा हक है। लिविंग विल एक लिखित दस्तावेज होता है जिसमें कोई मरीज पहले से यह निर्देश देता है कि मरणासन्न स्थिति में पहुंचने या रजामंदी नहीं दे पाने की स्थिति में पहुंचने पर उसे किस तरह का इलाज दिया जाए। पैसिव यूथेनेशिया (इच्छामृत्यु) वह स्थिति है जब किसी मरणासन्न व्यक्ति की जीवनरक्षक प्रणाली को रोक अथवा बंद कर दिया जाय। हालांकि ‘लिविंग विल’ अर्थात मौत की वसीयत पर कुछ लोगों ने आशंका जताई है कि इसका दुरुपयोग भी किया जा सकता है।

इच्छामृत्यु पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी-


1. एक वयस्क व्यक्ति जो किसी ऐसी बीमारी से जूझ रहा है जो कभी ठीक नहीं हो सकती है। बीमारी की वजह से घोर पीड़ा में जीवन काट रहा है और जिसके स्वस्थ होने की कोई आस नहीं बची है। वह अगर लिखित में इच्छामृत्यु की मांग करे तो उसके घरवालों को अथवा डाॅक्टर को उसका इलाज रोक देने या बंद करने की अनुमति होगी। इसमें दवाई, डायलसिस और वेंटिलेशन जैसे जीवनरक्षक सपोर्ट को रोक देने या बंद कर देने की अनुमति है।

2. ‘लिविंग विल’ के लिए किसी ऐसी लाइलाज और पीड़ादायक बीमारी से जूझ रहे व्यक्ति को एक मेडिकल पैनल के समक्ष इच्छामृत्यु की अर्जी देनी होगी। ‘लिविंग विल’ पर पैनल के लोग पहले पूरी जानकारी लेंगे और फिर पीड़ित के घर वालों से राय लेंगे, इसके बाद पीड़ित को कुछ समय तक ‘कूलिंग पीरियड’ में रखा जाएगा, जिसके बाद ही अर्जी कोर्ट तक पहुंचेगी।

पैसिव और ऐक्टिव इच्छामृत्यु में क्या अंतर है?

किसी लाइलाज और पीड़ादायक बीमारी से जूझ रहे व्यक्ति को निष्क्रिय रूप से इच्छामृत्यु दी जाएगी। इसका मतलब यह है कि पीड़ित व्यक्ति के जीवनरक्षक उपायों (दवाई, डायलसिस और वेंटिलेशन) को बंद कर दिया जाएगा अथवा रोक दिया जाएगा। पीड़ित स्वयं मृत्यु को प्राप्त होगा। ऐक्टिव इच्छामृत्यु का अर्थ होता है इंजेक्शन या किसी अन्य माध्यम से पीड़ित को मृत्यु देना। सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव इच्छामृत्यु की अनुमति दी है, ऐक्टिव की नहीं।

किन रोगों में इच्छामृत्यु की अनुमति है?

सुप्रीम कोर्ट ने किसी ऐसे विशेष रोग का उल्लेख नहीं किया है। अगर डाॅक्टर्स को लगता है कि पीड़ित के स्वस्थ होने की कोई आस नहीं बची है तो उसके परिवार वालों से सलाह करके निष्क्रिय इच्छामृत्यु दी जा सकती है।
अगर रोगी पूरी तरह सोचने समझने में सक्षम है तो भी क्या निर्णय परिवार वालों का ही होगा?
नहीं, ऐसी अवस्था में निर्णय लेने का अधिकार पूरी तरह पीड़ित का होगा।
यह पूरी तरह डाॅक्टर्स की जिम्मेदारी होगी कि वे मरीज के दर्द को और ना बढ़ने दें।

यदि कोई व्यक्ति 45 वर्ष से कोमा में हो, स्वयं का कार्य करने में असमर्थ हो, उसके लिए जीवन और मृत्यु का कोई अर्थ न हो, जीवन के स्पंदन से जिसका कोई सरोकार न हो, जो अनंत पीड़ा में रहने को विवश हो, उसे देखकर सहसा यह प्रश्न उठना स्वभाविक है कि क्यों न इसे जीवन से मुक्ति दे दी जाये। जब देह लगभग मृत हो जाये, तब उसका मोह छोड़ना ही सर्वोत्तम मार्ग है। इस सत्य को भारतीय मनीषा स्वीकार करती है। यही कारण है कि भारत में सर्वोच्च अदालत से लगातार मांग की जा रही थी कि वह दयामृत्यु को सहमति प्रदान करें। दयामृत्यु ग्रीक शब्द यूथेनेशिया का हिन्दी अनुवाद है। जो बना है म्न अर्थात ळववक तथा जींदंजवे अर्थात कमंजी – मृत्यु से।

सल्लेखना से इच्छा मृत्यु की तुलना उचित नहीं


अपनी मृत्यु का सम्मानजनक तरीका चुनने का अधिकार उन सभी को है जो अपना जीवन कठोर परिश्रम, मेधा और लगन से निर्मित करते हैं। जो अपने जीवन के शिल्पकार हैं वह अपनी मृत्यु को भी किसी शिल्प की भांति गढ़ सकते हैं। जैन धर्म संभवतः विश्व का पहला ऐसा धर्म है जिसने मृत्यु को शिल्पाअंकित करने की अनुमति प्रदान की है। जब सुप्रीम कोर्ट में इच्छा मृत्यु को स्वीकृति प्रदान की गई, उसी समय जैन धर्म में प्रचलित संथारा अथवा सल्लेखना की तुलना इच्छा मृत्यु से करने का प्रयास हुआ जो की नितांत गलत और आध्यात्मिक रूप से अनुचित है। इच्छा मृत्यु एक बेजान हो चुके शरीर द्वारा किया जाने वाला अंतिम उपाय है। जब शरीर असाध्य रोग से ग्रसित हो या जीवन रक्षक प्रणाली पर निर्भर हो ऐसे समय में मुक्ति दिए जाने को इच्छा मृत्यु कहा जाता है। लेकिन संथारा एक तरह की साधना है, जिसमें साधक साक्षी भाव से अपने शरीर से प्राणों को जाते हुए देखता है। जीवन के सभी पुरुषार्थ करने के बाद जब आयु पूर्ण होने की स्थिति में हो और यह लगने लगे कि शरीर आत्मा का बोझ उठाने में समर्थ नहीं है। शरीर कृशकाय हो चुका है, जीवन पूर्ण हो चुका है। अब आत्मा को नया शरीर धारण करने का मार्ग प्रशस्त करना चाहिए। ऐसी स्थिति में संथारा अथवा सल्लेखना ग्रहण की जाती है। इसमें साधक धीरे धीरे अन्न, जल इत्यादि का त्याग करते हुए समाधि पूर्वक मृत्यु का आवाहन करता है और मृत्यु का वरण करता है। यह समाधिमरण एक आध्यात्मिक प्रक्रिया है यह पलायन नहीं है और न ही आत्महत्या के समान कायरता पूर्वक किया जाने वाला आत्मघात है। बल्कि हजारों वर्षों से जैन अनुयायियों द्वारा सम्मानपूर्वक मृत्यु का वरण करने की एक उज्जवल परंपरा है। यदि यह कायरता होती तो भारतवर्ष के अंतिम ज्ञात चक्रवर्ती राजा चंद्रगुप्त सल्लेखना पूर्वक समाधि मरण का मार्ग नहीं अपनाते। जिसने भारत की सीमाओं का विस्तार किया और जिसने सर्वप्रथम अखंड भारत का सपना साकार किया उसी चंद्रगुप्त ने कर्नाटक के श्रवणबेलगोला स्थित चंद्रगिरी की पहाड़ियों पर सल्लेखना पूर्वक अपना जीवन त्यागा था। जैन धर्म में सल्लेखना का अनेक स्थान पर उल्लेख हुआ है। भारतवर्ष में अनेक जैन तीर्थ और जैन स्थल हैं जहां पर साधकों ने सल्लेखना पूर्वक समाधि ली है। चंद्रगिरि की पहाड़ियों पर भी लगभग 600 शिलालेख उत्कीर्णित हैं जिनमें सल्लेखना पूर्वक समाधि मरण का उल्लेख किया गया है। अनादि काल से चली आ रही इस परंपरा को वर्ष 2015 में राजस्थान के किसी निखिल सोनी द्वारा राजस्थान हाई कोर्ट में जनहित याचिका लगाते हुए प्रतिबंधित करवा दिया गया था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रतिबंध को हटा लिया। उस समय सल्लेखना को लेकर व्यापक बहस भी हुई। राजस्थान हाईकोर्ट ने इस पर कई सवाल भी उठाएं। लेकिन जब सुप्रीम कोर्ट के विद्वान न्यायाधीशों के समक्ष जैन धर्म के मर्मज्ञ विद्वानों और अधिवक्ताओं द्वारा सल्लेखना के पक्ष में सारगर्भित प्रमाण दिए गए तो सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान हाई कोर्ट का फैसला पलट दिया। आज सल्लेखना की तुलना इच्छा मृत्यु से किया जाना एक तरह से अज्ञानता और अधूरी जानकारी का प्रमाण है। जिन्हें सल्लेखना के विषय में जानकारी प्राप्त करना है उन्हें जैन आगमों का अध्ययन अवश्य करना चाहिए ताकि उनका भ्रम मिट सके और इस अद्भुत समाधि मरण की परंपरा को लेकर उनका अल्प ज्ञान बेहतर हो सके।

दयामृत्यु या इच्छामृत्यु का निर्णय तलवार की धार पर चलने के समान है। प्रश्न यह उठता है कि जब किसी को दो पल का जीवन दिया नहीं जा सकता तो उसे मारने का क्या अधिकार है। कोमा से दशकों बाद बाहर निकलने के लाखों में से एक उदाहरण देखने को मिलता है। दूसरी तरफ कुुछ रोग ऐसे हैं जिनका इलाज आज के विज्ञान के पास भी नहीं है। मांसपेशियों, हड्डियों के कुछ रोगों और कैंसर की अंतिम स्टेज में दयामृत्यु को उचित माना जाता है, क्योंकि ऐसे रोगी असह पीड़ा झेलते हैं, जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। कुछ बच्चे भी जन्मजात बीमारियों में जकड़े होते हैं, जिनका जीवित रहना उनके स्वयं के लिए भी सुखदायी नहीं रहता। आस्टेªलिया में एक नवजात की जीवन रक्षक प्रणाली उसके माता-पिता के अनुरोध पर हटा ली गई, क्योंकि उसका बचना लगभग असंभव था।

पीड़ा का लम्बा सिलसिला


हिमाचल प्रदेश के पालनपुर के निकट एक गांव में रहने वाली सीमा सूद नामक स्वर्णपदक विजेता स्नातकोत्तर इदंजीनियर ने 7 मई 2008 को राष्ट्रपति के समक्ष दयामृत्यु की याकिा लगाकार सबाके चैंका दिया। सीमा हड्डियों की असाध्य बीमारी से पीड़ित थी। उसके कंधे, कोहनी और कूल्हे बेजान हो चुके थे। वह एक छोटे से कमरे में वर्षांे से कैद थी। उसके इलाज पर लाखों खर्च होने के बावजूद लाभ नहीं मिला। इसी सदमें में पिता का देहांत सन् 2000 मेें हो गया। जिस मां को वह सहारा दे सकती थी, उसी 70 वर्षीय मां के सहारे दर्द से तड़पती सीमा ने जब दयामृत्यु की याचिका लगाई तो हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्राी प्रेम कुमार धूमल की संवदेनाएं सिहर उठी और उन्होंने सीमा के समस्त इलाज का खर्च सरकार द्वारा वहन करने की घोषणा कर दी।

11 अगस्त 2009 को अपने 4 पुत्रों की दयामृत्यु की याचिका राष्ट्रपति के समक्ष लगाने वाले जीत नारायण और उनकी धर्मपत्नी प्रभावती शायद इतने भाग्यशाली नहीं थे। उनके 4 बेटे 10 वर्षीय सुरेश, 11 वर्षीय बृजेश, 14 वर्षीय सर्वेश और 16 वर्षीय दुर्गेश मांसपेशियों की असाध्य बीमारी से पीड़ित थे। गर्दन के नीचे के शारीरिक अंगों को ये बच्चे हिलाने में असमर्थ थे। यह त्रासदी पांच वर्ष की आयु में सबसे बड़े बेटे के साथ शुरू हुई और फिर हर अगला बच्चा पांच वर्ष की आयु के बाद इसी असाध्य रोग की जकड़न में आ गया।
अप्रैल 2005 में अमेरिका के फ्लोरिडा शहर के निवासी टेरी शियावो को जब वहां की अदालत ने दया मृत्यु की अनुमति प्रदान कर दी तो बिहार की कंचन देवी के पति एवं पुत्रा को भी आशा बंधी और उन्होंने अदालत में एक बार फिर कंचन देवी के लिए शांतिपूर्ण दयामृत्यु की मांग की जो कि पांच वर्ष से कोमा में थी।

वर्ष 2004 में जुलाई माह में हैदराबाद के 25 वर्षीय वैंकटेश ने अंतिम सांस ली तब भी दया मृत्यु की बहस चल पड़ी थी। राष्ट्रीय शतरंज चैम्पियन रह चुके वैंकटेश भी जीवन से संघर्ष कर रहे थे। मां अंगदान करना चाहती थी इसलिए उन्होंने दयामृत्यु की मांग की।
9 मार्च 2011 को बिहार के मुजफ्फरपुर की आशा देवी पत्राकारों से बात करते समय बिलख उठी। उन्होंने कहा, ‘कौन अभागी मां अपने बच्चों के लम्बी जीवन की कामना नहीं करती। किन्तु मुझे दुर्भाग्यवश अपने दोनों बेटों को तड़पते देखना पड़ रहा है और मैं चाहती हूं कि वे इस जीवन से मुक्ति पा जायें। आशा देवी के दोनों बेटे 15 वर्षीय नितिन और 13 वर्षीय अंशू मांसपेशियां टूटने की असाध्य बीमारी से पीड़ित थे।

वर्ष 2001 में पटना हाईकोर्ट ने तारकेश्वर च्रंदवंशी की याचिका ठुकरा दी थी जिसमें उन्होंने अपनी पत्नी की दयामृत्यु की अपील की थी।
कई देशों में युथेनेशिया को जायज ठहराया गया है। आॅस्टेªलिया, उत्तरी अमेरिका आदि में कुछ शर्तो के साथ दयामृत्यु या इच्छामृत्यु दी जा सकती है। भारत में भी दबे, छुपे, युथनेशिया डाॅक्टरो द्वारा किया जाता है। जब डाॅक्टर यह मान लेते हैं कि मरीज को जीवित रखना उसकी पीड़ा को बढ़ा सकता है और उन्हें यह विश्वास हो जाता है कि इसका जीवन किसी भी उपचार से संभव नहीं है तो वे मरीज को मुक्ति दे देते हैं, किन्तु कानूनी तौर पर इसे हत्या ही कहा जायेगा। एक अनुमान के अनुसार दुनिया की जनसंख्या में लाखों लोग ऐसे हैं जिनका जीवन और मृत्यु समान है। ये सब दयामृत्यु के पात्रा हैं।

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