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संल्लेखना और इच्छामृत्यु का अंतर जानना होगा?

मेरी दृष्टि

संल्लेखना और इच्छामृत्यु का अंतर जानना होगा?

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भाररतीय संस्कृति के तीन प्रमुख विश्वासों में आत्मा की अमरता, पुनर्जन्म तथा कर्म सिद्धांत है। कर्मों के अनुसार परिणाम होते हैं और उसका फल मिलता है। अब ये सिद्ध करने लायक बात नहीं रह गई है कि कर्म क्या है। शरीर से किए जाने वाले कर्म हैं और मन से किए जाने वाले कर्म हैं। दोनों के परिणाम हैं। पर शरीर से किए जाने वाले कर्मो से भी ज्यादा घातक या सुखद भावों के परिणाम हैं।
आत्मा शरीर से भिन्न है। इसलिए देह में रहते हुए भी, देह को मंदिर मानते हुए भी उसमें प्रतिष्ठित देवता तो आत्मा ही है। इसलिए शरीर है पर आत्मा मैं हूं। जो मेरा है वह आत्मा है, जो मैं हूं वह आत्मा है। जो अजर-अमर-अविनाशी है। देह नश्वर है इसलिए देह से मैं भिन्न हूं और आत्मा मेरा चलाने वाला है। देह घोड़ा है सवार आत्मा है।

इसलिए जब भारतीय संस्कृति में देह और आत्मा की भिन्नता को मान लिया जाता है। तो जितनी आयु एक जन्म विशेष में लिखी या निश्चित होती है, वह जब पूर्ण होने की ओर आने लगे तो जो लोग देह से परे हो जाते हैं और आत्मस्वरूप में स्थित होना चाहते हैं, निज स्वरूप को प्राप्त करना चाहते हैं वे जीवन भर साधना के उस मार्ग पर चल पड़ते हैं जिससे कर्म कटते जावें अर्थात उनकी निर्जरा होती जावे और वे अपने विशुद्ध स्वरूप को प्राप्त कर सकें। अर्थात जहां क्रोध, मान, माया, लोभ, मोह आदि कषायों से रहित समभावना पूर्वक, समता के साथ, राग-द्वेष रहित जीवन व्यतीत करते हुए समभाव से मृत्यु की प्रतीक्षा की जावे। यह मृत्यु का आह्नवान कहा जा सकता है। उसमें धीरे-धीरे कर्मों को भी कृश किया जाता है अर्थात कर्मों के बंधनों को कम करते हुए, क्षीण करते हुए और उसके साथ-साथ शरीर को भी कृश किया जाता है, साधना के साथ।


साधना समता की, साधना भावों की निर्मलता की, शरीर के द्वारा किए जाने वाले कर्मों को भी कम करते हुए, मन और चित्त को एकाग्र करते हुए, उस भाव में रम जाना कि जहां ध्यान की एकाग्रता इतनी हो जावे कि और ध्यान को उस सीमा तक ले जा सके कि वह व्यक्ति शरीर का भान भूल जावे और वैसा करते-करते समाधि को प्राप्त करते हुए मरण को प्राप्त करे। कृशकाय हो गए शरीर को छोड़कर मृत्यु का सहर्ष स्वीकार संल्लेखना है। अर्थात सत्लेखन करते हुए, अपने आत्मस्वरूप का ध्यान करते हुए, उसका लेखन अर्थात लिखते हुए उसमें एकाकार हो जाना और उस समाधि भाव को प्राप्त होते हुए मरण होना, इस जीवन की साधना का कलश है।

जैन धर्म और संस्कृति इसी मुख्य विचार पर केंद्रित है। दिगंबर मुनि दीक्षा, आर्यिका दीक्षा इसी एक अवस्था को प्राप्त करने के लिए है कि जीवन में साधना, तप करते हुए उस एकाग्र स्थिति को अंतिम क्षण में पहुंच जावे जहां आत्मा और देह की भिन्नता का अनुभव हो सके। इसके लिए जैन आगम अथवा शास्त्रों में एक पूरी वैज्ञानिक विधि दी गई है और यह आत्महत्या नहीं है। यह आत्मघात नहीं है। यह विशुद्धि पूर्वक, भावों को शुद्ध करते हुए जब शरीर ऐसा हो जावे कि वह आगे और गुणवत्तापूर्वक जीने लायक न रह जाए तो उस जीर्ण-शीर्ण शरीर को फटे-पुराने वस्त्रों के समान ही त्याग देना है।


फटी हुई साड़ी में कितने पैबंद लगाए जा सकते हैं और कितने लगाए जाने चाहिए। यह टेक्नोलाॅजी का विकास नहीं है कि हम वेंटिलेटर पर महीनों, वर्षों कोमा में पड़े शरीर को जीवित रखें। जैसा हमने पूर्व प्रधानमंत्राी अटल बिहारी वाजपेयी के साथ किया हुआ है। उससे बड़ा उदाहरण और कुछ नहीं हो सकता, जो शरीर किसी काबिल नहीं है उस शरीर को समय रहते छोड़ देना ही बेहतर है। यही तो भारतीय संस्कृति है। शरीर कुछ कह नहीं सकता, कुछ सुन नहीं सकता, बता नहीं सकता, लेकिना पीड़ा भोगने को विवश है। क्योंकि उससे अस्पताल का बिल बढ़ता है। डाॅक्टर की फीस बढ़़ती है, कितना कष्ट होता है यह वे जानते हैं जो मृत्युशैया पर पड़े हैं। धीरे-धीरे, जबरदस्ती खिलाया भोजन, आहार और अकथनीय पीड़ा, असहनीय वेदना। उसको जबरन वेंटिलेटर पर रख देना। यह कोई जीवन नहीं है।


हम जीवित रहते हुए भी गुणवत्तापूर्ण जीवन की बात करते हैं तो मृत्युशैया पर पड़े अपंग, असहाय व्यक्ति के विषय में हम यह विचार क्यों नहीं कर पाते। यह इच्छा मृत्यु की बात ही नहीं है। कोई मांग ही नहीं रहा है इच्छामृत्यु। अगर वह वेंटिलेटर के बिना जीवित रह सकता है, उसके जीवन की गुणवत्ता बढ़ सकती है तो बढ़ाएं, लेकिन वह न करके हम उसे असहनीय पीड़ा, असहनीय नरक भोगने के लिए विवश करते हैं।

मुझे स्मरण है कि जीवन भर देव दर्शन करके भोजन करने वाले, दिन-रात उनका स्मरण करने वाले मेरे पिता अंतिम समय में तीन-चार दिन लगातार कहते रहे कि नली निकाल दो मुझे पीड़ा होती है, इशारा करते रहे, संकेत देते रहे, मुझे चैन से रहने दो। लेकिन जो परिजन यह नहीं समझ पाते कि मरने वाले की अंतिम इच्छा क्या है और वह क्या चाहता है, स्वतंत्राता चाहता है, शांतिपूर्वक मरण चाहता है उसे वेंटिलेटर पर रखकर नलियों से रस देकर जीवित रखने की कोशिश अपने परिजनों को मर्मांतक पीड़ा देना है। इसे रोकने की आवश्यकता है और इससे बचने की एक सार्थक युक्तिपूर्ण तकनीक है संल्लेखना।

इसलिए संल्लेखना को आत्मघात कहना नितांत गलत है, भारतीय संस्कृति के खिलाफ है। कर्नाटक के हासन जिले में स्थित श्रवणबेलगोल में, जहां गोमटेश की विश्व की सबसे बड़ी एकाश्म 58 फुट ऊंची प्रतिमा विराजमान है, वहां की चंद्रगिरि पहाड़ी पर संल्लेखना के सैकड़ों उदाहरण पत्थर पर उत्कीर्णित पड़े हैं। वे सब जीवन भर ज्ञानी, त्यागी, वृती लोग थे जिन्होंने अपने आपको ज्ञान के द्वारा समझना चाहता था, जिन्होंने आत्मस्वरूप को पहचानना चाहा था, वे मूर्ख नहीं थे, वे आत्मघाती नहीं थे। उन्होंने सोच-समझकर एक सजग, सुविचारित निर्णय लिया था।

इसलिए जैन धर्म कहता है देह धर्म आत्म धर्म नहीं है। जब साधक अपनी साधना के द्वारा देहातीत होने का पुरुषार्थ करता है, देहाभ्यास भूल जाता है तब वह आत्मविग्रह नहीं है। वह सजगता के साथ की गई साधना है। लोक में रहते हुए भी लोकातीत होने का आनंद लेना है। क्षण-क्षण में निज स्वरूप से बात करना है। उस आनंद में लीन होना है जिस परमानंद की प्राप्ति भारतीय संस्कृति के समस्त मूल धर्मों का आधार है। भावों को निरंतर शुद्ध करते जाना और सहज मरण को प्राप्त होना मोक्ष प्राप्त करने का सर्वश्रेष्ठ साधन है।
ओशो ने अकारण नहीं कहा है कि मृत्यु उत्सव है, महोत्सव है। जन्म लेते समय जीव नहीं जान पाता कि मैंने कब जन्म लिया, लेकिन मृत्यु के समय नया जन्म लेने के लिए, अच्छी गति पाने के लिए मृत्यु को यदि सजग रहकर गले लगा लिया जावे, आह्नान कर लिया जावे तो वह मृत्यु उत्सव में परिवर्तित हो जाती है।

इच्छामृत्यु को संल्लेखना कहने वाले अज्ञानी हैं। इसको कानून के नियमों में बांधने वाले भारतीय संस्कृति से अपरिचित हैं। मेरा परिजन पीड़ा में जाये, उसकी जगह शांति पूर्वक सांसें लेते हुए अपनी अंतिम सांसों में सजग रहते हुए सांसों को देखता हुआ अपने को उस आत्मभाव में लीन करता हुआ जाये। इसमें से कौन सी अच्छी मृत्यु है और किस मृत्यु का वरण मरने वाला चाहता है?

संविधान के द्वारा प्रदत्त वैयक्तिक स्वतंत्राता वैंटिलेटर पर रखने से नहीं प्राप्त होती। यहां मरने की स्वतंत्राता कहने का अर्थ आत्महत्या की स्वतंत्राता नहीं है यह आत्महत्या की वकालत नहीं है। आत्महत्या कानूनन अपराध है। असमय आत्महत्या करने वाले के लिए भारतीय संस्कृति के सभी धर्मों और दर्शनों में कहा गया है कि उसकी परिणिति सही नहीं होती और असमय शरीर घात करने से नर्क की प्राप्ति होती है।
असल में आत्महत्या का नाम ही गलत है। आत्महत्या नहीं वह शरीर हत्या, देह हत्या कहना चाहिए। आत्मा की तो कभी हत्या नहीं हो सकती, आत्मा का तो घात कभी हो ही नहीं सकता। जो अघाती है, अनश्वर है, अनंत है, उसका कैसे घात होगा। उसकी हत्या कौन करने वाला है, वह तो मरणशील है ही नहीं। मरणशील तो काया है। जब वह जी नहीं सकती तो उसकी हत्या कैसे हो सकती है।

जो व्यक्ति वैंटिलेटर पर तीन-चार वर्ष से पड़ा है, कोमा में है। एक वैजिटेबल के समान उसे रखने से किस का क्या लाभ है। न उसकी आत्मा का कोई विकास हो रहा है और न शरीर की कोई गुणवत्ता बढ़ रही है। सिर्फ सांसें घसीटने से कोई फायदा नहीं है। यह भारतीय संस्कृति के नितांत विरूद्ध है। इसीलिये इच्छा मृत्यु और संल्लेखना एक बात नहीं है। संल्लेखना पूर्ण चेतना के साथ मृत्यु को उत्सव के रूप में स्वीकार करना है। वह भी तब जब शरीर इतना योग्य न रह जाए कि वह जीवन को और आगे बढ़ा पाए। जब जीवन की गुणवत्ता घटने लगे, शरीर असहाय होने लगे तब उसको मृत्यु के लिये तैयार करना। यदि हम जन्मोत्सव की तैयारी करते हैं, जीवन में ऐसे अवसरों जिनको हम उत्सव कहते हैं, की तैयारी करते हैं तो पुराना शरीर छोड़कर नया शरीर धारण करने का आवाहन भी तो करना चाहिए।

मृत्यु तो नया शरीर धारण करने की, नया, सुंदर, स्वस्थ शरीर पाने की प्रक्रिया मात्रा है या उस जन्म-मरण से छूट जाने की विधि है जो साधना के द्वारा दिगम्बर साधू करते हैं या और भी योगी, साधू, तपस्वी करते हैं।
हमारी भारतीय संस्कृति में इसका उल्लेख है, न तो वह झूठे थे और न ही वे असत्य थे, न ही वे अज्ञानी थे और न ही उनकी कही बातें निराधार हैं। इसीलिये संल्लेखना का स्वागत होना चाहिए। अगर आयु समुचित आयु है या व्यक्ति का शरीर इतना बीमार है कि गुणवत्ता पूर्ण जीवन जिया नहीं जा सकता। असाध्य रोगों से पीड़ित है। तो उसकी पीड़ा भोगने से अच्छा कि उसको उसकी इच्छनुसार मृत्यु का वरण करने दिया जावे और अपना शरीर छोड़ने की अनुमति उसे दी जावे। उसका कोई प्रावधान कोई नियमावली बनाई जा सकती है। ताकि कोई उसका अवैध लाभ न उठा सके। लेकिन 12-12 वर्ष कोमा में रखकर जीवित रखने का कोई औचित्त नहीं है। किसी की कम उम्र है तो बात अलग है, जिसकी आयु पूर्ण हो चुकी है। भारतीय संस्कृति के अनुसार वह वानप्रस्थ अवस्था में आ चुका है और उसका शरीर साथ नहीं दे रहा है तो उसे उसकी इच्छा से सम्मानपूर्वक मृत्यु का अधिकार है।

बीमार शरीर को अकारण जीवित रखने का आग्रह परिजनों द्वारा नहीं किया जाना चाहिए। संल्लेखना मृत्यु का ऐसा प्रकार है जिसका चारों तरफ स्वागत होना चाहिए और उसी का उदारहण देते हुए भारतीय कानून में आवश्यक परिवर्तन किया जाना चाहिए। भारतीय संस्कृति में जिन महापुरूषों ने मरण के यथार्थ को समझ लिया है, आत्मसात कर लिया है, उन्होंने उसे मृत्यु महोत्सव कहा है।
जैन दर्शन जिस तरह जीवन जीने के लिये प्रश्स्त मार्ग की अनुमोदना करता है। उसी प्रकार मरण के मार्ग को भी प्रश्स्त बनाने के साधन बताता है। मरण की इसी प्रशस्तता का नाम संल्लेखना या समाधि मरण है। गरिमा पूर्वक मृत्यु का आलिंगन, सजग रहते हुए, सुजाग रहते हुए सम्पूर्ण चेतना के साथ। जिसमें आवेश नहीं है, किसी का भय नहीं है, कोई दबाव नहीं है, कोई व्याकुलता नहीं है। किसी वेदना से छुटकारा पाने के लिये नहीं है। समताभाव में, साक्षी भाव में रहते हुए मृत्यु को आते हुए देखना और अपनी चेतना को सामुहिक चेतना में एकाकार कर देना संल्लेखना है।

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