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कैसा हो इतिहास लेखन

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कैसा हो इतिहास लेखन

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आक्रमणकारियों का बखान या गौरवशाली भारत का गान

17 सितम्बर को उच्चतम न्यायालय में प्रथम बार मैंने प्रवेश किया था। राम जन्मभूमि मंदिर विवाद में प्रतिदिन सुनवाई चल रही थी। इतिहासकार होने के नाते मैं भी शुरुआत से ही राम जन्मभूमि आन्दोलन से जुड़ी हुई थी। इसे देखने और सुनने की उत्सुकता थी। मुस्लिम पक्ष की ओर से राजीव धवन अपनी बात सुना रहे थे। तथ्यों से दूर और आधारहीन। उनके कथन में अनेक विसंगतियाँ थीं। दुराग्रह साफ झलकता था। हिन्दुस्तान के बच्चे-बच्चे को मालूम है कि भारतवर्ष में जितने भी आक्रमणकारी मुस्लिम शासक आए उनमें से एक भी ऐसा नहीं था जिसने गैरमुस्लिम पूजा स्थलों को तोड़ने का दुष्कृत्य न किया हो। मध्ययुगीन मुस्लिम शासकों की यह मनोवृत्ति उनके धर्म का हिस्सा थी। जो दुराग्रह भारतीय संस्कृति के प्रति पश्चिमी और वामपंथी भारतीय इतिहासकारों के रहे हैं, जो कि अयोध्या विवाद में स्पष्ट रूप से उजागर हुए, वही दुराग्रह भारत के इतिहास लेखन में भी दिखता है। राष्ट्रीय शैक्षणिक अनुसंधान परिषद द्वारा प्रकाशित और तैयार की गई इतिहास की पुस्तकों को देखने से यह साफ हो जाता है कि स्वतंत्रा भारत में भी भारत के इतिहास लेखन में कैसा खिलवाड़ किया गया, जैसे एक साजिश चल रही हो। एक ऐसी दुरभिसंधि जिसे हम स्वतंत्राता के 70 वर्षों के बाद भी न तोड़ पाए न भेद पाए।
साहित्य यदि इतिहास का मुख है तो पुरातत्त्व उसकी आँखें। साहित्य जो सुनाता है पुरातत्त्व उसे दिखाता है। कभी-कभी पुरातत्त्व जो दिखाता है साहित्य उसमंे मौन रह जाता है। कभी-कभी साहित्य जो सुनाता है, पुरातत्त्व उसे दिखा नहीं पाता। इसीलिये साहित्य और पुरातत्त्व एक-दूसरे की पुष्टि भी करते हैं और एक-दूसरे के पूरक भी हैं। अयोध्या के मामले में साहित्य और पुरातत्त्व के दोनों प्रकार के साक्ष्य उपलब्ध थे। किंतु फिर भी भारतीय संस्कृति विरोधी और वामपंथी विचारधारा के इतिहासकारों ने तथ्यों का इस प्रकार विकृतिकरण किया कि जिस विषय में पहले किसी भारतीय के मन में शंका नहीं थी, उस पर भी सवाल उठाये गये। यह दुराग्रह था, जो आज भी चला आ रहा है।
राजस्थान की पाठ्यपुस्तकों में वीर सावरकर के द्वारा यातनाओं से घबराकर चार बार अंगे्रजों से माफी माँगने का प्रक्षेप जोड़ा गया है। इसके कोई प्रमाण नहीं हैं। इसका उद्देश्य क्या है? अंगे्रजों की चमचागिरि या भारतीय स्वतंत्राता संग्राम और स्वतंत्राता सेनानियों का अवमूल्यन? ऐसा ही एक ”साम्प्रदायिकता का उदय“ नामक अध्याय पूर्व में भी जोड़ा गया था, जिसमें भाजपा व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को बदनाम करने की कोशिश की गई थी। समझा जाता था कि अंग्रेज इतिहासकारों ने अपने कोलोनियल आईने से जो भारत का इतिहास लिखा, आजादी के बाद उसमें सुधार होगा। स्वतंत्राता पश्चात भारतीय इतिहास लेखन और पठन-पाठन की जो दुर्गति हुई, वह अकल्पनीय, निंदनीय, भत्र्सनीय और किसी भी स्वाभिमानी राष्ट्र के लिए शर्मनाक है।
एक माह पूर्व अपने विद्यालय में बैठी, मैं सीबीएसई की कक्षा 6वीं, 7वीं और 8वीं की राष्ट्रीय शैक्षणिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद के द्वारा तथाकथित रूप से बड़ी शोध के साथ तैयार की गई इतिहास की पुस्तकें देख रही थी। देखकर लगा कि जितना दुराग्रह अंग्र्रेज इतिहासकारों ने नहीं दिखाया, उससे अधिक भारत विरोधी सोच तो स्वतंत्रा भारत की इन पाठ्यपुस्तकों में परिलक्षित हो रही है। ऐतिहासिक तथ्यों का विकृतिकरण, भारतीय संस्कृति की तमाम अच्छाईयों को नजरअंदाज करके, भारत की सभी उपलब्धियों को नकारना और भारत के महान नायकों, शूरवीरों, संतों, अवतारों, बलिदानियों, योद्धाओं का विकृत चरित्रा-चित्राण ही जैसे स्वतंत्रा भारत के इतिहास लेखन की पहचान बन गई है।
यह देश का दुर्भाग्य ही था कि एकाध अपवाद को छोड़कर स्वतंत्राता के बाद, जितने भी मानव संसाधन विकास मंत्राी हुए, या तो वे भारतीय इतिहास को ठीक से जानते नहीं थे या जानना नहीं चाहते थे, और यदि जानते थे तो भारतीय विचार व संस्कृति के प्रति उनकी सोच उजली नहीं थी और वे केवल या तो इस्लामिक विचारधारा के प्रतिपादक थे या वामपंथी सोच के प्रवक्ता। देश विरोधी कांगेे्रस की नीतियों के अनुरूप ही वे काम करते रहे और देश के सभी नीति निर्धारक शिक्षण संस्थानों, शोध संस्थानों और विभागों में ऐसे ही वामपंथी इतिहासकारों की नियुक्ति होती रही। उन्होंने ही एनसीईआरटी की पुस्तकों को लिखा और भारतीय इतिहास को विकृत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 6वीं कक्षा की श्व्नत च्ंेजश्ए च्ंतज 1 में भारत के लिखित इतिहास के प्रथम प्रतापी और चक्रवर्ती सम्राट, मौर्य वंश के संस्थापक चंद्रगुप्त मौर्य के बारे में जिस प्रकार गैर जिम्मेदाराना ढंग से 3-4 पंक्तियों में वर्णन है, वह विचारणीय है। इस महान सम्राट की दिनचर्या एक राजा के रूप में प्रजा के कल्याण के लिये काम करने का सर्वाधिक महत्वपूर्ण दस्तावेज है। ग्रीक दूत मैगस्थनीज ने भी जिसकी प्रशासनिक क्षमता, युद्धकौशल और अद्भुत सैन्य संचालन का विस्तृत वर्णन किया और जिसने कांधार से लेकर दक्षिण भारत तक अखण्ड व एकछत्रा साम्राज्य की स्थापना की और जो फिर पल भर में मात्रा 50 वर्ष की आयु में सब कुछ त्याग कर जैन मुनि हो गया, उसकी उपलब्धियों का कुछ भी वर्णन नहीं करना क्या ठीक है? अशोक को छोड़कर चंद्रगुप्त के पुत्रा बिन्दुसार और अन्य मौर्य वंशजों का भी उल्लेख करना इन इतिहासकारों ने ठीक नहीं समझा। विश्व के महान् अर्थशास्त्राी, सफल कूटनीतिज्ञ, कुशल रणनीतिकार और श्रेष्ठतम् प्रशासक और चंद्रगुप्त के गुरु महामात्य चाणक्य का भी एक वाक्य, ष्। ूपेम इतंीउपद ब्ींदंालं ंकअपेमक ब्ींदकतंहनचजं डवनतलंष् में उल्लेख करके निपटा देना, उसी विकृत सोच की बानगी है?
भारतीय इतिहास के एकमात्रा ब्राह्मण सेनापति, कुशल योद्धा और देशभक्त पुष्यमित्रा शुंग, जिसने 179 ई.पू. नाकारा और कायर अंतिम मौर्य सम्राट ब्रहद्रथ का वध करके देश को यवनों से बचाया, का उल्लेख क्या आवश्यक नहीं है? कालिदास के प्रसिद्ध नाटक मालविकाग्निमित्राम् के नायक और पुष्यमित्रा के वीर पुत्रा अग्निमित्रा, जिसने अश्वमेघ यज्ञ किया और विशाल मौर्य साम्राज्य शत्राुओं से बचाये रखा, जिसका उल्लेख अयोध्या के एक मंदिर से प्राप्त अभिलेख में मिलता है, से परिचय करवाना भी आवश्यक है? गौतमी पुत्रा शातकर्णी और कलिंग के प्रतापी जैन शासक खारवेल के बारे में भी उल्लेख ना करना क्या दर्शाता है? गुप्त वंश के संस्थापक श्रीगुप्त से लेकर प्रतापी चंद्रगुप्त प्रथम, समुद्रगुप्त और चंद्रगुप्त द्वितीय जिसने शक आक्रांता का वध करके, ‘शकारी’ की उपाधि प्राप्त की और ‘विक्रमादित्य’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ और उसके यशस्वी पुत्रा स्कंदगुप्त तक, जिसने हूणों के आक्रमण से देश को बचाया, उन सब की गौरव गाथाएँ भारतीय इतिहास का अभिन्न हिस्सा हैं, और उनकी वंशावली का जिक्र तक नहीं?? गुप्तकाल भारतीय इतिहास का स्वर्णयुग है, जिसमें शिल्प कला, चित्राकला, नृत्य-संगीत, वाणिज्य, उद्योग, व्यापार अपने चरम वैभव तक पहुँचे। इनका विस्तृत वर्णन करके भारत की भावी पीढ़ी को भारत के वैभवशाली अतीत से परिचित कराने की जिम्मेदारी किसकी थी? मुगल साम्राज्य की वंशावली का चित्रा सहित विस्तृत वर्णन है। किन्तु, भारत के राजाओं के बारे में सतही चर्चा करके छोड़ दिया जाए, उनके वंशों का जिक्र न किया जाए, इससे क्या साबित होता है? और आक्रमणकारी विदेशी शासकों का गुणगान किया जाए यह अपने देश के प्रति कौनसा भाव दर्शाता है? ये इतिहासकार लिख रहे हैं कि गजनी का शासक महमूद गजनी भारत पर आक्रमण करने इसलिये आया क्योंकि मंदिरों के स्वर्ण ने उसे आकर्षित किया। यह क्या तर्कसंगत है? इसलिये उसने मंदिर तोड़े? क्या यह ऐतिहासिक सत्य नहीं है कि गजनी ने काफिरों के मंदिर धर्म के नाम पर तोड़े और उसे इसकी उपलब्धि के लिए इस्लामिक साहित्य में ‘गाजी’ कहा गया? क्या यह भारत के लिये अपमानजनक नहीं है? कि पाकिस्तान उसे अपना महान पुरुष मानकर अपने मिसाइलों का नाम, जिनके मुख भारत की तरफ रहते हैं, ‘गजनी’ रखता है और हमारे इतिहासकार ऐसे नृशंस आक्रांता को ‘गजनी का शासक’, ‘गजनी का सुल्तान’ बताते हुए, उसकी तुलना दक्षिण के महाप्रतापी राजा राजराजेश्वर चोल से कर रहे हैं। जिसने अन्य राज्यों पर विजय प्राप्त करके, उस राज्य के प्रमुख मंदिर की मूर्ति की, अपने राज्य में लाकर प्रतिष्ठा की। और इतिहासकार पुस्तक में सवाल पूछते रहे हैं कि तुलना करें कि राजराजेश्वर चोल और महमूद गजनवी में क्या साम्य है?? बच्चों के मन में यह भरा जा रहा है कि गजनी और गौरी जैसे मुस्लिम आक्राताओं ने भारत के साथ कुछ गलत नहीं किया है। कितनी खूबसूरती से भारत के ऊपर सुनियोजित आक्रमण करने वाले की भारतीय शासकों से तुलना की है। भारत पर हजार वर्ष पूर्व हुए इन आक्रमणों को पाकिस्तानी, इस्लामिक देशों और इंग्लैण्ड के नहीं भारत के इतिहासकार न्यायोचित ठहरा रहे हैं?? राजराजेश्वर चोल ने तंजावुर का सर्वाधिक ऊँचा शिखरयुक्त प्रसिद्ध बृहदेश्वर मंदिर बनवाया था। उसने कभी किसी के धर्मस्थलों को नष्ट-भ्रष्ट नहीं किया। मंदिरों की महत्ता का अवमूल्यन करते हुए लिखा जा रहा है कि भारतीय राजा विशाल मंदिर बनवा कर अपनी शक्ति का प्रदर्शन करते थे? ये इतिहासकार कैसे भूल गये कि भारत के प्राचीन मंदिर ही भारत की पहचान हैं और भारत की कला एवं संस्कृति को संजोए हैं। वे ही भारतीय कलाओं के विकास, संरक्षण और प्रदर्शन का केंद्र बनें। इन्हीं मंदिरों से भारतीय कला को पहचान मिली। वास्तुकला, शिल्पकला, संगीतकला, नाट्यकला अपने चरम उत्कर्ष पर इन्हीं मंदिरों से पहुँची। मंदिर ही जनता के सार्वजनिक मिलनस्थल थे। मंदिर निर्माण, अकाल व सूखे की दशा में जनता के लिये किये गये राहत कार्य थे। ये इतिहासकार क्या परोक्ष रूप से यह नहीं कर रहे कि भारत में जो भी सराहनीय कला-शिल्प हैं वे 13वीं शती के बाद मुसलमानों की देन हैं और तृतीय शती ईसा पूर्व से 12वीं शती तक जो भी कला के नाम पर है, वह कुछ भी नहीं है?? पृथ्वीराज चैहान का वर्णन एक अद्भुत वीर योद्धा और आन पर मिटने वाला क्षमाशील और विशाल हृदय राजा के रूप में होना चाहिए था, जिसने शत्राु को भी जीवनदान दिया। किंतु उसका उल्लेख केवल एक पंक्ति में कि ‘उसने एक अफगान शासक महमूद गजनी को हराया’ कह कर काम चला लिया गया।
भारतीय इतिहास में सर्वाधिक महत्वपूर्ण मोड़ लेने वाली इस घटना में इस बात का उल्लेख नहीं है कि कृतघ्न और धोखेबाज मोहम्मद गौरी ने फिर आक्रमण करके अपने उपकारकर्ता के साथ कैसा अपकार किया?
क्या आज पूरे विश्व को यह स्पष्ट नहीं है कि इस्लाम के मानने वाले आक्रमणकारियों की आक्रमण पद्धति जजिया, असहिष्णुता, धार्मिक-स्थलों को नष्ट करना, तलवार की नोक पर धर्म परिवर्तन करवाना, जबरदस्ती दूसरों पर इस्लाम थोपना रहा है? इस तथ्य के उल्लेख के बगैर भारत के इतिहास का लेखन कैसे सही, तथ्यपरक और प्रामाणिक माना जा सकता है। केवल वोट बैंक या किसी वर्ग विशेष की भावनाओं को ठेस ना पहुँचे, इसलिए क्या इतिहास बदल देंगे? हजारों वर्षों के अत्याचार, अनाचार, क्रूरता, दमन के शिकार भारत के बहुसंख्यक हिन्दु मानस को अपने गौरव पुरुषों पर गर्व करने का भी अधिकार नहीं है? कुतुबुद्दीन ऐबक ‘कुतव्वल मस्जिद’, महरौली, दिल्ली में उत्कीर्णित शिलालेख, जिसमें लिखा है कि ‘39 मंदिरों को तोड़कर यह मस्जिद तामील की गई’, के उल्लेख के बगैर कुतुबुद्दीन के बारे में कोई बात कैसे हो सकती है। वह विदेशी आक्रांता अलाउद्दीन खिलजी का सेनापति था, इससे अधिक उसकी क्या पहचान होनी चाहिए। संयोगिता को यमुना के दर्शन कराने निमित्त बनाये गये स्तम्भ को तोड़कर वहाँ कुतुबमीनार खड़ी की गई, इस सत्य को कैसे नजरअंदाज किया जा सकता है। ताजमहल के विश्व धरोहर बनने से पहले चित्तौड़ में बने मानस्तम्भ/जय स्तम्भ के बारे में उल्लेख नहीं होना चाहिए, जो भारतीय संस्कृति की अतुल्य धरोहर है? अकबर की तथाकथित यूनिवर्सल धर्मनीति ‘दीन ए इलाही’ का अनेक शब्दों में बखान करने से पहले उसकी तुलना भारतीय राजाओं की धार्मिक सहिष्णुता से करना चाहिए। भारत के तीर्थों का उल्लेख करते समय वृंदावन की चर्चा करते हैं और अयोध्या, मथुरा, काशी को भूल जाते हैं। टीपू सुल्तान का वर्णन ऐसे किया जाता है जैसे वह भारत का शत्राु था और अंगे्रज भारत के शुभचिंतक। अंगे्रजों की युद्ध नीतियों के तैल चित्रा छपे हैं किंतु भारत के शूरवीर महाराणा प्रताप, शिवाजी, छत्रासाल, हेमु, बाजीराव आदि राजा-महाराजाओं का एक भी चित्रा नहीं।

बने हैं एहले हवस मुद्दई भी मुन्सिफ भी, किसे गवाह करें किससे मुन्सिफी चाहें।
8वी की इतिहास की पाठ्यपुस्तक का एक वाक्य है ‘ब्पअपसप्रपदह जीम छंजपअमे’ तथा ‘म्कनबंजपदह जीम दंजपवद’. शर्म से डूब नहीं मरना चाहिए? ये किस देश के इतिहासकार हैं, इंग्लैण्ड के या भारत के? जैसे भारत के सारे लोग असभ्य और गँवार थे। स्कोटिश स्काॅलर विलियम एडम्स की रिपोर्ट के अनुसार केवल बिहार और बंगाल में ही एक-एक शिक्षक और बीस-बीस छात्रों की एक लाख पाठशालाएँ थीं, जो स्थानीय शिक्षा की आवश्यकताओं को पूर्ण करने में समर्थ थीं। किन्तु मैकाले ने ब्रिटिश साम्राज्य की विस्तारवादी नीति के चलते, किस प्रकार भारत की पूरी-पूरी शिक्षा प्रणाली को नष्ट भ्रष्ट करके भारतीयों को सभ्य बनाने का अभियान छेड़ा, उसी का परिणाम तो भारत आज तक भुगत रहा है। ये भारतीय इतिहासकार, भारतीय इतिहास लेखन करते समय उस देश को ‘सिविलाइज्ड’ करने की बात कर रहा है जो कभी विश्व गुरु था, जिसने विश्व को ज्ञान का पाठ पढ़ाया, जहाँ महान् सभ्यता ने जन्म लिया और जो आज तक भी जीवित हैं। यह इतिहास लेखन इंग्लैण्ड के छात्रांे के लिये हैं या भारतीयों के लिये। ऐसी मिसाल विश्व में अन्य कहीं नहीं है। मुझे एक बहुत ही विद्वान आईएएस आफीसर की टिप्पणी याद आती है कि हम भारतीय अपने आप को जूता मारने में बहुत कुशल हैं।
और यह सिद्ध हो भी गया। अनुच्छेद 370 हटाने पर जिस प्रकार और व्यवहार और प्रदर्शन विपक्ष ने किया, वह विश्व के किसी स्वाभिमानी राष्ट्र में कभी नहीं हुआ। देश के विरुद्ध जाकर, शत्राु के पक्ष में खड़े हो जाना?? इस सब के मूल में ऐतिहासिक तथ्यों का विकृतिकरण ही है। भारतीय स्वतंत्राता संग्राम में सम्मिलित लाल, बाल व पाल तीनों नेताओं के योगदान के बारे में तो कोई महत्वपूर्ण टिप्पणी है ही नहीं, देश पर प्राण न्यौछावर करने वाले भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु का सतही उल्लेख और उनके नामों से पहले शहीद भी नहीं लगाना, क्या उनकी शहादत का अपमान नहीं हैं? मौलाना आजाद का इतिहास के बहुत बड़े विद्वान और भाषाओं के ज्ञाता के रूप में 12 पंक्तियों में महिमामंडन पर आपत्ति नहीं है, किन्तु इसी पृष्ठ पर राष्ट्रीय एकता के कर्णधार, 655 रियासतों का भारतीय संघ में संविलीयन कराने वाले सरदार वल्लभभाई पटेल थे, यह जानकारी नहीं देना घोर आपत्तिजनक है। मोहम्मद अली जिन्ना को कोमल शब्दों में पाकिस्तान बनाने के सबसे बड़े प्रवक्ता न कह कर, भारत के दो टुकड़े करने वाला और हिंदु-मुस्लिम भाई-चारे को समाप्त करने वाला कहा जाता तो क्या अधिक सही न होता?
इस प्रकार की अनेक विसंगतियों तथा असन्तुलन से भारतीय इतिहास की ये पाठ्यपुस्तकें भरी पड़ी हैं। स्वतंत्रा भारत के महानायक नरेंद्र मोदी जी से इस देश को बहुत आशाएँ हैं। उन्होंने बहुत कुछ कर दिया है लेकिन बहुत कुछ करना बाकी है। यदि अब भारतीय इतिहास की पाठ्यपुस्तकों में व्याप्त इन विसंगतियों को दूर नहीं किया गया तो फिर कभी नहीं होगा। ‘इतिहास का भगवाकरण’ हो रहा है, चिल्लाने वाली देश विरोधी वामपंथी ब्रिगेड फिर चिल्लाएगी। चिल्लाने दें। जो सही है वो है। यही कारण है कि भारत के अधिकांश विश्वविद्यालयों से प्राचीन भारतीय इतिहास का अध्ययन धीरे-धीरे समाप्त हो गया और उसके स्थान पर धीरे-धीरे मध्यकालीन महिमामण्डित अतिरंजित मुगल इतिहास कब स्थापित हो गया। यह चिंता का विषय है।
वोट बैंक की राजनीति के चलते ऐतिहासिक तथ्यों के साथ खिलवाड़ की ही परिणिति है भारत का विभाजन और इसी का परिणाम है भारत और विश्व में फैलता आतंकवाद। यही कारण है कि भोपाल की दीवारों पर सिमी के सदस्य ‘वेटिंग फाॅर गजनी टू कम’ और ‘गजनी कम बैक’ के नारे लिखने का साहस कर पाये। इसी मानसिकता की दुष्परिणिति है कि जेएनयू में ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ के नारे लगे। जब तक इतिहास की पुस्तकों में, देश पर आक्रमण करने वालों को आक्रांता न कह कर सुल्तान कहकर सम्बोधित किया जाता रहेगा तब तक दिग्विजय सिंह और राहुल गांधी जैसे लोग ‘ओसामाजी’ और ‘हाफिज सईद जी’ कहते रहेंगे, और संसद में खड़ा होकर ओवैसी कह पाता है कि ”नरेंद्र मोदी मेरे प्रधानमंत्राी नहीं हैं“, कहने का दुस्साहस करता रहेगा।
प्रश्न है कि भारतीय इतिहास लेखन का उद्देश्य महानायकों की शौर्यगाथाओं का वर्णन कर के और भारत की प्राचीन कला, शिल्प, उद्योग, व्यापार, लौह निर्माण, वास्तु कला आदि का गौरवगान करके पे्ररणा देना और देश के प्रति आत्मगौरव भाव को जाग्रत करना है या विदेशी आक्रांताओं द्वारा हजार वर्षों तक भारतीयों पर किए अनाचारों, अत्याचारों, अन्याय, उत्पीड़न, दमनकारी शासन को छिपा कर उनका महिमामण्डन कर भारतीयों में पुनः हीन बोध भरना।
एक राष्ट्र महान् बनता है अपने अतीत की सफलताओं से पे्ररणा लेते हुए और अतीत की गलतियों से सीखते हुए आगे बढ़ने से। तथाकथित बुद्धिजीवियों के द्वारा अपने ही देश और उसकी संस्कृति के विरुद्ध जहर उगल कर, भावी पीढ़ी को गलत व्याख्याओं, तोड़-मरोड़ कर पेश किये गये साक्ष्यों, कपोल कल्पित तथ्यों पर आधारित इतिहास से दिग्भ्रमित करना बौद्धिक आतंकवाद है और ये सीमा पार के आतंकवाद से भी ज्यादा खतरनाक है। यही कारण है कि जिस समय संसद पर हमला हुआ था, उस समय विपक्ष पाठ्यपुस्तकों में किंचित् परिवर्तन के विरुद्ध भगवाकरण का आरोप लगा रहा था। यही कारण है कि लश्करे तैयबा, जैशे मोहम्मद और सिमी जैसे संगठन भारत में गौरी और गजनी की प्रतीक्षा करने का दुस्साहस करते हैं।
हर भारतीय के मन में जब तक अपने देश के प्रति सम्मान और गौरव का भाव नहीं होगा, तब तक इस बौद्धिक आतंकवाद से मुक्ति नहीं मिल सकती। भारत को, भारतीय इतिहास के सही परिपे्रक्ष्य में, प्रामाणिक तथ्यों के साथ, भारतीय दृष्टि से पुनः लेखन की तत्काल और गम्भीर आवश्यकता है। हमें तय करना होगा कि भारत का इतिहासलेखन कैसा हो। आंक्राताओं का महिमामंण्डन करके भारत के बच्चों में हीन बोध भरा जाए या भारत के गौरवशाली अतीत का बखान करके उन्हें गौरव भाव से भरा जाए।

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