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संस्कृति को सहेजना भगवाकरण नहीं है

मध्यप्रदेश / संस्कृति

संस्कृति को सहेजना भगवाकरण नहीं है

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संस्कृति की मात्रा विभागीय पहचान नहीं है, वह तो वृक्ष में रस की तरह हमारे जीवन की संपूर्ण व्याप्ति और विस्तार में मौजूद है। मध्यप्रदेश में संस्कृति को उसकी इसी प्रकृति के अनुसार देखने और प्रोत्साहित करने की कोशिश हुई है। इस कारण अनेक विभाग अपनी-अपनी तरह से संस्कृति के संदर्भ में विभिन्न पहलें कर रहे हैं। कुछ लोगों को लगता है कि यह कोई इस या उस दिशा के किसी प ंथ का मामला है, जबकि संस्कृति तो जैसा कि हमने कहा, सर्वत्रा विस्तृत है। सभी दिशाओं में संस्कृति विकास की आत्मा है। यदि नहीं है तो होनी चाहिए। आज का समय जितना विकास से परिभाषित होता है, उतना ही विकास की अवधारणा के चलते संस्कृतियों के संकट से भी। विकास की इस एकरैखिक आधुनिक सोच के चलते समूचे विश्व मे अनेक भाषाएं और संस्कृतियां लोप की कगार पर हैं।

मध्यप्रदेश की सरकार आधुनिकता के इस संकट को पहचानते हुए विकास को समाज की आंतरिक और स्वाभाविक लय से जोड़ रही है। भारतीय परंपरा और संस्कृति के आलोक में जन सामान्य के जीवन को फिर से समृद्ध करने के प्रयासों में महती कार्य यहां किए गए हैं। समाधानात्मक सह-जीवन का अपना एक विशिष्ट स्वप्न लेकर मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्राी चल रहे हैं। स्वप्न गैर-संघर्षात्मक और मुख्यतः एक तरह का सांस्कृतिक अभियान है। प्रशासन में सांस्कृतिक पूंजी का वे निःसंकोच उपयोग कर रहे हैं। इहलौकिकता के चक्कर में राज्य ज्यादा से ज्यादा एक कंस्ट्रक्ट या एक निमित्त बनता जाता है और उतना ही कम आर्गेनिक होता जाता है। आज हम आर्गेनिक फूड की मांग करते हैं, आर्गेनिक राज्य की मांग क्यों नहीं करते? एक ऐसा राज्य जो ज्यादा प्रकृतिस्थ हो, जो बिना किसी कुंठा के अपने सामाजिक संप्रेेरकों का इस्तेमाल करता हो। आलोचक मध्यप्रदेश की भाजपा सरकार की इस दृष्टि को एक नए तरह का भगवाकरण कह रहे हैं, जो शिक्षा ही नहीं, प्रशासन के पूरे परिदृश्य में व्याप्त है। अभी तक सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के पक्षधरों की आलोचना यह कहकर की जाती थी कि उन्हें अपने स्वप्न के बारीक व्यावहारिक डिटेल्स नहीं मालूम, लेकिन मुख्यमंत्राी लगातार बता रहे हैं कि उन्हें इसे चरितार्थ करने की यांत्रिकी आती है। इसमें वे निरंतर सफल भी रहे हैं।

स्कूलों मेें सूर्य नमस्कार के महाआयोजन को लेकर विवाद शुरू करने की असफल कोशिश की गई थी। यह तब हुई जब सूर्य नमस्कार पूर्णतः ऐच्छिक था,  जब सूर्य नमस्कार के साथ मंत्रा का उपयोग न कर एक, दो, तीन जैसे अंकों का उपयोग किए जाने के निर्देश दिए गए  थे। क्या शालाओं में इसके पहले पीटी नहीं होती थी। क्या मंत्रा के बिना सूर्य नमस्कार सिर्फ कुछ आसनों  का समुच्चय नहीं रह जाता? क्या आसनों से भी धर्म भ्रष्ट हो जाता है?

सवाल यह है कि शिक्षा को समाज से काटकर हम यह शिकायत कैसे कर सके हैं कि विद्यार्थी शिक्षा पूरी करने के बाद समाज में नहीं लौटता। उसके लौटने के रास्ते हमने ही कहीं बंद तो नहीं कर दिए? कहीं हमने ही तो नहीं उन सेतुुओं के स्तंभों के नीचे बारूद लगा रखी है जो एक यौगिक रसायन के जरिए हमारे छात्रा को हम तक पहुंचाता था? पहले वर्ग में पढ़ाने वाला गुरू छात्रा को तैयार करके समाज में भेजता था। आज समाज में पढ़ाने वाला शिक्षक ब्रेन डेªन तय कर उसे कंक्रीट के जंगल में भेजता है। वुड ने गुलाम भारत में शिक्षा का डिस्पेच तैयार किया था। एक भिन्न अर्थों में शिक्षा स्वयं एक डिस्पेच है, एक प्रेषण। सवाल यह है कि उस प्रेषण का पता (एडेªस) क्या है? मुख्यमंत्राी छोटी-छोटी चीजों से बार-बार उस फांक की ओर इशारा कर रहे हैं जो समाज और राज्य के बीच पड़ गई है।

यह फांक धर्मनिरपेक्षता की ओर हमारे बढ़ने से हुई है या यह अंग्रेजी औपनिवेशिक सत्ता के होने का परिणाम था? क्योंकि वे इस समाज में पराए थे और इस फांक के बिना वे अपने राज की स्ट्रक्चरल वैलिडिटी के प्रति आश्वस्त नहीं हो सकते थे।

शिवराज सरकार कक्षा 4 में येाग शिक्षा और कक्षा 8 में अंग्रेजी में योग टीचिंग का पाठ ला रही है। उसने व्यापक योग नीति घोषित की है। इसके लिए भी अभी आलोचकों की प्रतीक्षा है, क्योंकि बिना उन आलोचनाओं के यह स्थापित नहीं होता कि अपनी ही सामाजिक पूंजी से वितृष्णा किए बगैर कुछ लोगों का मनस्तोष होता ही नहीं। यह स्थिति तब भी देखने में आई थी, जब कुछ पिष्ट पोषित नर्सरी राइम्स को पाठ्यक्रम से हटाने पर शोर उठा। कुछ अंग्रेजी अखबारों के लिए तो जैसे यह राष्ट्रीय शोक की घड़ी थी। काली भेड़ें जा रही थीं। जाॅनी, जाॅनी के जाने का भी गम सता रहा था। हिकोरी-डिकोरी की हिचकियां आने लगीं। लिटिल स्टार अब टिमटिमाएंगे भी नहीं। मातम का माहौल था। क्या होगा? जिन लोगों के लिए विद्यार्थी मात्रा एक ऐसा बर्तन है जिसे भरा जाना है, वे विशेषकर आहत थे। जिन लोगों के लिए विद्यार्थी एक आग है जिसे प्रज्ज्वलित होना है, उनके लिए यह अवसर था। मां-बाप खासकर मध्यवर्गीय मां-बाप के लिए, गर्व का एक क्षण गया। कितना सरल था अपने बेटे को अतिथियों के सामने खड़ा कर देना: बेटा, अंकल को एक पोएम सुनाओ और बेटे का शुरू हो जाना: जैक एंड जिल, वेंट अप द हिल। अब सब गड्ड-मड्ड हो गया है।

मध्यप्रदेश शासन ने कहा कि हम अंगेजों के सदियों पुराने पाठ क्यों पढ़ाएं? बात थी भी ऐसी। ट्विंकल-ट्विंकल 1806 में पहली बार प्रकाशित हुई थी। हिलोरो डिकोरो 1744 में। इसी 1744 में ही बा-बा ब्लैक शीप का प्रकाशन भी हुआ। रेन रेन गो अवे क्वीन, एलिजाबेथ प्रथम (1533-1603) के समय की है। जैक एंड जिल का प्रथम प्रकाशन वर्ष 1795 है। बा-बा ब्लैक शीप को तो अभी 1999 में इंग्लैंड की बर्मिंघम सिटी कौंसिल ने स्कूलों में सिखाने लायक नहीं माना था, क्योंकि इसे जातीय रूप से नकारात्तमक समझा गया था। इसलिए कहीं तो इसे ग्रीन शीप के रूप में बदला गया और कहीं किसी और तरीके से। हमारे भारत के स्कूलों में जब ये राइम आई तो बच्चों को संदर्भ और परिवेश के प्रति अंधा बनाने के उद्देश्य से आई। इसलिए इन राइम का वह अर्थ भी गायब हो गया, जिसने इनमें एक चुभन भी पैदा की थी।

बा बा ब्लैक शीप यूं तो 1744 में छपी थी, लेकिन इसका उद्गम 13वीं शती का है, जब राजा ने ऊन पर कर लगाया। इससे ऊन का एक तिहाई स्थानीय लार्ड (मास्टर), एक तिहाई चर्च (डेम) और एक तिहाई किसान को जाता था।

यह राइम अत्याचारी करारोपण व्यवस्था की स्मृति थी, किंतु हमारे स्कूलों में कब इसे उस रूप में पढ़ाया गया? बच्चे को अतिथि के सामने एक पोएम सुनाने के लिए खड़ा करते हैं। वह सुनाता है राइम और चूंकि वह राइम भी अपनी ऐतिहासिकता और प्रसंग से च्युत है, इसलिए वह भी सिर्फ एक तरह का नानसेंस वर्स होकर रह जाती है।

फिर हम शिकायत करते हैं कि नई पीढ़ी नानसेंसिबल होती जा रही है। क्या तुमक कविता का स्थानापन्न हो सकती है, लेकिन मध्यवर्गीय शानो-शौकत को शायद इसी तरह के शार्टकट पसंद हैं, जो कविता की रचनात्मक को तुक की आदत से प्रतिस्थापित करते हैं। जरूरी नहीं कि राइम रचनात्मकता को हतोत्साहित करें। पर अकादमियां व परिषदें सीखने का एक पठार बचपन में खड़ा कर देती हैं तो राइम के मुहाने पर भी रचनात्मकता संभव नहीं हो पाती। अन्यथा ट्विंकल टिवंकल लिटिल स्टार पर ही ढेरों पैरोडिया बनी हैं। ल्यूइस कैरोल की एलिस के वंडरलैंड में जो एडवंेचर हैं उसी में ट्विंकल ट्विंकल लिटिल बैट/हाऊ आई वंडर व्हाइट यू आर एट वाली पैरोडी है। सीसेम स्ट्रीट की हिसल-हिसल लिटिल बर्ड भी इसी से प्रेरित है। नाइजेल काल्डर ने इसकी एक खगोलीय पैरोडी तैयार की ट्विंकल टिवंकल लिटिल स्टार/वी नो एक्जेक्टली व्हाट यू आर/न्यूक्लीअर फर्नेस इन द स्काई/यू विल बर्न टु एशेज/आई डोंट वंडर व्हाट यू आर। विलियम प्राट्ट और डेग्रासी ने भी इसी तरह अपनी पैरोडी इस राइम पर लिखी। वहां चूंकि यह राइम मां के रक्त और दूध में मिलकर आती है तो वह रचनात्मकता का एक अवकाश भी साथ लाती है।

भारत में यह एक औपनिवेशिक परंपरा का हैंगओवर है तो बस ऐसे ही लटकी रहती है। यह एक ही राइम भारत में राइम की तरह चलती है किंतु ब्रिटेन में यह पांच छंदों की कविता की तरह प्रचलित है। हम्प्टी-डम्प्टी 1642-49 के अंग्रेजी गृह युद्ध में एक शक्तिशाली तोप का नाम था जो चर्च टावर पर रखी रहती थी और जब शत्राु ने इस टाॅवर को उड़ाया तो यह तोप पर गिर पड़ी और राजसैनिकों के चढ़ाए न चढ़ी। इसलिए लिखा गया था हम्प्टी डम्प्टी सेट आन अ वाल/हम्प्टी डम्प्टी हैंड अ ग्रेट फाल, लेकिन अब तो यह दीवार पर चढ़े दो बच्चों के बारे में पंक्तियों की तरह पढ़ाई जाती है।

कैसे निहायत अकल्पनाशील और भोंडे तरीके से हम इन राइमों को बच्चे के मस्तिष्क में ठूंसते हैं? कैसे हम इन राइमों को उनकी सृजन पीठिका और ऐतिहासिक अनुभवों से सर्वथा पृथक कर एक छोटे से बच्चे के ०दयाकाश को बंधक बनाने के काम में लाते हैं? रेन रेन गो अवे तो स्पेनिश आर्मेडा वाले युद्ध के समय  खराब मौसम से विचलित जहाजियों की पुकार थी, मानसून पर निर्भर हमारे भारत के लोग कभी रेन रेन गो अवे क्यों कहेंगे?

जैक एंड जिल की राइम के पीछे फ्रांस में हुई राजा लुई सोलहवें और रानी मेरी एंटोनिएट की गिलोटिन थी। हमारे यहां तो इस राइम के पीछे का दर्द गायब ही हो गया है। जिस उम्र में ये राइम सीखी-सिखाई जाती है वह उम्र बालक सृजनात्मक कल्पना की उर्वरता की चरम उम्र है। उस सुकुमार आयु में बालक की अपनी रचनात्म्कता को स्थगित कर हमारे द्वारा गिनती की दस राइमो की ये पुड़िया थमा दी जाती है। फिर हम शिकायत करते हैं कि पब्लिक स्कूलों से कोई लच्छू महाराज, कोई प्रेमचंद, कोई सुदामा प्रसाद पांडेय धूमिल नहीं प्रगट होते। बच्चे की प्रकृत प्रतिमा की तरंग को सींचने और विकसित करने की जगह हम उसकी खोपड़ी में रटन्त राइम्स का दम भरकर प्रसन्न हो जाते हैं।

एक देवशिशु को औपनिवेशिक गुलामी की अनदेखी कारा में कैद करने की इस प्रवृत्ति पर आपत्ति क्यों न होनी चाहिए?

सरकार ने वही किया। शिवराज जी का कुल जमा कहना यही था कि आज दो-चार राइम्स को हटा देने पर इतना शोर हो रहा है, लेकिन उनके समय में यह कदंब का पेड़ अगर मां होता यमुना तीरे पढ़ाई जा रही थी और आज नहीं पढ़ाई जा रही। इस पर कभी आपत्ति क्यों नहीं हुई? शिवराज के इस प्रश्न का इसके सिवा क्या उत्तर है कि मातृभाषा में मौलिकता के अवसर ज्यादा हैं, जबकि अंग्रेजी में चर्चिचर्वण के सिवाय मार्ग क्या है?

शिक्षा में और भी परिवर्तन हुए हैं और जब हम विचारधारात्मक परिवर्तनों का उल्लेख कर रहे हैं तो आशय यह नहीं है कि भौतिक परिवर्तन नहीं हुए। सर्वशिक्षा अभियान व मिड डे मील में मध्यप्रदेश का स्थान कुछ मामलों में देश में दूसरा है। 46 लाख बालिकाओं को निशुल्क गणवेश, 1 करोड़ 6 लाख बच्चों को निशुल्क पाठ्यपुस्तक, 9वीं कक्षा में प्रवेश लेने वाली बच्चियों को निशुल्क साइकिलें, समस्त प्राथमिक स्कूलों को भवन, दस हजार से ज्यादा प्राथमिक शालाओं में किचन शेड, ब्लाॅक स्तर पर उत्कृष्ट विद्यालयों की स्थापना, पेयजल व्यवस्था, गांव की बेटी योजना, आॅपरेशन क्वालिटी जैसी चीजों के बारे में हम यहां चर्चा नहीं कर रहे हैं, लेकिन वे हो रहे हैं। इसलिए उस तरह के सस्तेपन के साथ हम यहां विवेचन नहीं करना चाहेंगे, जैसे एक टीवी चैनल ने नेहरूजी के पाठ को हटाने से उत्पन्न हुए विवाद पर किया।

एक जीर्ण-शीर्ण स्कूल का दृश्य दिखाकर चैनल ने कहा कि शिवराज तब कोर्स कंटेंट के चक्कर मंे हैं जब सरकारी स्कूल की हालत यह है। पाठ्यक्रम परिवर्तनका आशय भी यह नहीं है कि शिक्षा की भौतिक स्थितियों में परिवर्तन या उसकी बेहतरी की उपेक्षा की जा रही है। इसका आशय सिर्फ इतना है कि शिक्षा सिर्फ भवन ही नहीं है, भावना भी है। सिर्फ साधन ही नहीं, साधना भी है। ऐसी शिक्षा के क्या मायने जो शहीदों की साधना की उपेक्षा करे। स्वतंत्राता संग्राम के 150 वर्ष पर जब प्रधानमंत्राी ने मुख्यमंत्रियों और राजनीतिक दलों की बैठक बुलाई तो मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्राी ने यह प्रश्न रखा कि एक ओर तो केंद्र सरकार 1857 को भारत का प्रथम स्वतंत्राता संग्रम कह रही है और ठीक ही कह रही है, दूसरी ओर उसी केंद्र सरकार के मानव संसाधन विभाग के सीबीएसई पाठ्यक्रम में इसे ऐसा कहने से गुरेज किया गया है तथा इसे बार-बार विद्रोह और कभी-कभी कृपापूर्वक महाविद्रोह कहा गया है। यानी देश को समझाने के लिए इसे फ्रीडम स्ट्रगल कहेंगे और विद्यार्थियों को समझाने के लिए विद्रोह।

इस प्रकट असंगति के जरिए हम देश और शिक्षा के बीच व्यर्थ की द्वंद्वाात्मकता क्यों पैदा कर रहे हैं? आजादी के संघर्ष में आदिवासियों के योगदान को रेखांकित करना होगा। नेहरू जी का एक पाठ पाठ्यक्रम से निकालने को शिवराज सरकार के नेहरू विरोध के रूप में दर्ज किया गया, तब मध्यप्रदेश के तत्कालीन स्कूल शिक्षा मंत्राी ने उचित ही कहा कि जब दिग्विजय सरकार ने मां खादी की चादर दे दे, मैं गांधी बन जाऊ पाठ को पाठ्यक्रम से बाहर किया था तब यह यदि गांधी विरोध नहीं हुआ तो शिवराज सरकार कैसे नेहरू जी का एक कक्षा में एक पाठ हटाने और दूसरी कक्षा में उनका एक पाठ जोड़ने से नेहरू विरोधी बताई जा रही है?

कक्षा एक से लेकर कक्षा आठ तक की प्रत्येक कक्षा में नेहरू जी का एक पाठ है और आपत्ति यदि कोई है तो इस अतिरेक से है, नेहरूजी से नहीं। पाठ्यक्रम में आर्यों को बाहरी और आक्रमणकारी बताने जैसे एकांगी और अप्रामाणिक ठूसन पर भी शिक्षा विभाग ने करेक्टिव कदम उठाए हैं। कुल कोशिश यह है कि शिक्षा की सामाजिक जड़ों का मान किया जाए, ताकि दीक्षांत पर इसे समाज से एल्यिनेटेट हो चुके बच्चों का ही हासिल न रह जाए। संस्कृति और शासन के बीच में अंतराल का बढ़ना शासन का, आम जनता की नजरों में ज्यादा से ज्यादा अनात्मीय और पराया होते जाना है।

इसलिए मध्यप्रदेश शासन ने लगातार केाशिश की हैं कि संस्कृति को एक विभागीय तरीके से देखने की जगह उसे शासन-प्रशासन की बुनियादी प्रेरणा की तरह देखा जाए।

साभार: संस्कृति अभ्यूदय

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