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जब बेटियों का होगा सुरक्षित तन-मन तब मनेगा वास्तविक रक्षाबंधन

रक्षाबंधन विशेष

जब बेटियों का होगा सुरक्षित तन-मन तब मनेगा वास्तविक रक्षाबंधन

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सावन की हरियाली रिमझिम फुहार गांव के चैबारे, आम व नीम के वृक्षों पर पड़े हुए झूले और उन झूलों पर कजरी गीत गाती हुई युवतियां, महिलाएं और बच्चियां। ये दृश्य कभी बचपन में देखे थे, अब तो जिंदगी की तज रफ्तार, इंटरनेट की सोहबत में रहकर समय से पहले युवा होता बचपन तो कहीं खो गया है। दूसरा पहलू एक और भी है कि महिलाएं व बेटियां समाज में खुद को असुरक्षित महसूस कर रही हैं।

इस कारण से उन्होंने खुद को चारदीवारी में कैद कर लिया है, जहां वो कजरी नहीं गातीं एक ऐसे दर्द की रागिनी समा गई है आज स्त्राी के ०दय में जिसमें सिमटकर उसका जीवन बेसुरा हो गया है। आए दिन हम खबरें पढ़ रहे हैं कि कभी सौतेले पिता ने ही बेटी का रेप कर दिया, कभी स्वयं पिता या भाई ने रेप कर दिया, कभी चाचा, मौसा या फूफा ने नाबालिग बच्ची का बलात्कार किया। कभी कुछ मनचलों ने मोहल्ले की नाबालिग बच्ची का गैंगरेप कर दिया जिससे उसका प्राणांत हो गया, बाद में शव कहीं दूर झाड़ियों में फेंक दिया। ये घटनाएं आए दिन ही घटित हो रही हैं।

अभी कुछ दिनों पहले की घटना है जोधपुर राजस्थान के एक डाॅक्टर ने अपनी बीबी की 11 साल की भतीजी के साथ उसके सामने ही बलात्कार किया। ये सिलसिला चार साल चलता रहा। इस दौरान वो बच्ची प्रेग्नेंट भी हो ई। उस बहसी डाॅक्टर ने छह बार उसका एबाॅर्शन करवाया। परेशान होकर उसकी पत्नी ने अपनी भतीजी की शादी कहीं और करवा दी, किंतु ये सिलसिला तब भी नहीं थमा। वहां से उसको बुलाकर वह डाॅक्टर अपनी वासना शांत करता था।

उसके पति को सब-कुछ बताने की धमकी देकर लगातार वो उसका शोषण करता रहा। इतना ही नहीं, एक एमडी डाॅक्टर होने के बाद भी कई पेशेंट और नर्सों के साथ उसके शारीरिक संबंध थे। शादी से पहले उसकी पत्नी आशा शर्मा उसकी पेशेंट ही थी जिसे डाॅक्टर शफत उल्लाह खान ने अपने प्यार का झांसा देकर आयशा खान बना दिया। धर्म परिवर्तन करा निकाह करने के बाद आशा उसकी तमाम ज्यादती बर्दाश्त करती रही, किंतु उसकी ही भतीजी के साथ इतना क्रूर व्यवहार देखकर दोनों बुआ-भतीजी ने मिलकर उसे मारने का प्लान बनाया और अंततः पांच लाख की सुपारी देकर उस डाॅक्टर को ठिकाने लगा दिया।

इस घटना का उल्लेख महज इसलिए किया है कि डाॅक्टर को तो लोग भगवान का दर्जा देते हैं, जब वही ऐसे कांड करेगा तो बाकी आज जनता क्या करेगी? उस पर तो लोग आंख बंद कर विश्वास करते हैं, लेकिन रक्षक ही भक्षक बन जाते हैं तो समस्याओं का निराकरण कैसे हो?

भारत त्योहार प्रधान देश है। अभी हम 26 अगस्त को श्रावण पूर्णिमा पर रक्षाबंधन  पर्व मनाएंगे, किंतु मुझे नहीं लगता कि आज के समय में यह पर्व मनाने की आवश्यकता है। जब  बहनें-बेटियां अपने ही घर में सुरक्षित नहीं हैं, फिर अन्य समाज से क्या सुरक्षा की अपेक्षा रखें।

अभी कुछ दिनों पहले की ही घटना है। एक 12 वर्ष की बच्ची कुसुम के साथ उसके पिता ने दुष्कृत्य किया। मां को बताया तो मां ने बदनामी के डर से पुलिस में रिपोर्ट करने से मना कर दिया। पिता का साहस और बढ़ गया। वह बार-बार इस कृत्य को अंजाम देने लगा। उसका भाई सचिन कानपुर उत्तरप्रदेश में रहकर बी काॅम की पढ़ाई कर रहा था। रक्षाबंधन आने वाला था, बहन ने सोचा कि भाई बहन की रक्षा करता है। इस रक्षाबंधन पर भैया से इस नर्क से मुक्ति मांग लूंगी। मेरा भाई मुझे आजाद करा देगा। उसने सारी पीड़ा पत्रा में लिखकर भाई को भेज दी।

भाई रक्षाबंधन पर घर आया, उसने राखी तो बंधवाई, जब बहन ने अपने वचन पूरा करने को कहा तो भाई उसे एकांत में ले गया और कुसुम से कहा- मेरा बाप तो बूढ़ा हो गया है वह तुझे इतना आनंद नहीं दे पाता होगा, चल मैं तुझे जन्नत की सैर कराता हूं और सचिन कुसुम पर टूट पड़ा। एक बार और उसकी आत्मा तक घायल हो गई, क्योंकि आज तो कुसुम को बचाने की आखिरी उम्मीद ने ही उसके राखी के धागों को तारतार कर दिया था। अब तो यह नियम बन गया, कभी बाप तो कभी बेटा कुसुम का लगातार यशारीरिक व मानसिक शोषण करने लगे। 15 दिनों में इस यातना से कुसुम ऊब गई।

आखिर में उसने ग्वालियर छोड़ने का मन बना लिया। एक दिन चुपचाप स्टेशन आकर झांसी आ गई, जहां एक एनजीओ ने उसकी मदद की तथा जीवनयापन हेतु टेक्निकल शिक्षा भी उसे उपलब्ध करवाई व बाप-बेटे को आजीवन कारावास की सजा भी दिलवाई। ऐसी घटना से रक्षाबंधन पर्व का कोई औचित्य ही नहीं रह जाता। आज के युग में संबंधों की बुनियाद ही खोखली होती जा रही है। फिर हम क्यों झूठे रक्षा के वचनों का ढकोसला करते हैं, जबकि बहनों या बेटियों को सुरक्षित रख नहीं पा रहे हैं। अच्छा हो कि हम सभी भारत के पावन धरातल से ये ढोंग समाप्त कर दें।

राजनीतिक दल भी एक-दूसरे पर इन घटनाओं के लिए दोषारोपण करते हैं, जो कि किसी समस्या का हल नहीं है। हम-सब तीज-त्योहारों और स्वतंत्रा भारत की विशेषताओं का गुणगान करते रहें, किंतु इन निरंतर बढ़ती हुई घटनाओं पर अगर विराम नहीं लगा तो वह दिन दूर नहीं जब सारे देशों के लिए भारतीय संस्कृति एक हास्यास्पद नमूना बनकर रह जाए। अच्छा तो यह हो कि जो समाज में भेड़िए की खाल में राक्षस घूम रहे हैं, उन सभी का एक सर्वेक्षण होना चाहिए कि आखिर इनमें स्त्रिायों के प्रति संवेदनाएं हैं भी या नहीं।

मंत्रियों, राजनेताओं, आईपीएस, कलाकार, आम नागरिक सभी का मनोवैज्ञानिक परीक्षण होना चाहिए और इन्हें ए, बी, सी, डी की कैटेगिरी में रखकर ये अनुमान लगाना चाहिए कि जो डी कैटेगिरी यानी सबसे खराब मानसिकता के व्यक्ति हैं उन्हें समाज से अलग कर उनका उपचार कराना चाहिए, ताकि वास्तव में बेटियां सुरक्षि रह सकें, तभी रक्षाबंधन का सार्थक पर्व मनेगा। साल में दो बार नवरात्रि पर्व पर कन्या पूजन से और जय मादा दी के नारे लगवाने से मातृशक्ति सुरक्षित नहीं रह सकती, बल्कि समाज से ऐसे भेड़ियों को बहिष्कृत कर कठोर न्यायिक व्यवस्था से ही हम ऐसे दुराचारियों से समाज को भयमुक्त कर सकते हैं। हमारे देश में बटियों को पूर्ण सुरक्षित रख पाने से ही रक्षाबंधन का ये पर्व सार्थक होगा।

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