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क्या कांग्रेस केवल मुस्लिमों की पार्टी है

सवाल है

क्या कांग्रेस केवल मुस्लिमों की पार्टी है

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बीते 11 जुलाई को कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने गुपचुप तरीके से देश के कुछ मुस्लिम बुद्धिजीवियों से मुलाकात की। कहने को तो यह मुलाकात मुसलमानों से जुड़े मुद्दों और देश की वर्तमान राजनीतिक व सामाजिक स्थिति पर चर्चा के लिए थी। लेकिन इस मुलाकात में राहुल गांधी ने कहा ‘अगर भाजपा यह कहती है कि कांग्रेस मुसलमानों की पार्टी है तो हां मैं कहता हूं कि कांग्रेस मुसलमानों की पार्टी है। क्योंकि मुल्क का मुसलमान अब दूसरा दलित हो गया है। जबकि कांग्रेस हमेशा कमजोरों के साथ रही है।’

राहुल गांधी के इस कथन को उर्दू समाचार पत्रा इंकलाब ने ‘हां कांग्रेस मुसलमानों की पार्टी है’ शीर्षक से प्रमुखता से प्रकाशित किया। कांग्रेस के अल्पसंख्यक मोर्चे के प्रमुख नदीम जावेद ने भी इस कथन की पुष्टि की। राहुल गांधी के इस बयान से पहले केरल में मुस्लिम वोट खिसकने के भय से कांग्रेस ने रामायण आधारित एक कार्यक्रम को रद्द कर दिया। इसके बाद राहुल के इस कथन से एक तरह से कांग्रेस का चेहरा सामने आ गया। स्वाभाविक रूप से इसकी प्रतिक्रिया सारे देश में होना तय थी और वैसा हुआ भी। धर्मनिरपेक्षता तबके को छोड़ दिया जाए तो समाज के प्रायः हर वर्ग ने राहुल गांधी के इस बयान की आलोचना की है।

राहुल गांधी के कथन में गलत कुछ नहीं है।  एक राजनीतिक दल को और उसके नेता को यह कहने का हक है कि वह राजनीति में किन लोगों की नुमाइंदगी कर रहा है। यदि कांग्रेस दूसरी मुस्लिम लीग बनना चाहती है तो उसे ऐसा करने से भला कौन रोक सकता है? संवैधानिक रूप से भी इस पर पाबंदी नहीं लगाई जा सकती।

लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब कांग्रेस मुस्लिम पार्टी है तो उसके अध्यक्ष राहुल गांधी सहित तमाम नेता अपने हिंदू होने या हिंदू समर्थक होने का ढोंग क्यों करते हैं? पिछले कई चुनावों में राहुल गांधी ने समय के अनुसार अपने चोले में परिवर्तन किया। हिंदुओं के वोट पाने की खातिर वह मंदिर-मंदिर भटके, अनेक मठों में उन्होंने माथा टेका कर्नाटक में तो उनकी हर रैली की शुरुआत किसी न किसी मंदिर से होती थी, यह बात अलग है कि इतने पाखंड के बाद भी वह कर्नाटक में कांग्रेस को बहुमत नहीं दिला पाए। राहुल गांधी ही नहीं कांग्रेस का हर नेता आज इस तरह का पाखंड कर रहा है। मध्यप्रदेश में कमलनाथ उज्जैन के महाकाल को चिट्ठी लिखते हैं, उन्हीं की पार्टी के नेता महाकाल के नंदी के कान में सत्तासीन भारतीय जनता पार्टी को उखाड़ फेंकने की कामना करते हैं । सचिन पायलट से लेकर अशोक गहलोत तक सारे के सारे कांग्रेसी नेता मंदिर में शरणागती ले चुके हैं। कांग्रेस के युवा और अपेक्षाकृत पढ़े-लिखे खुले दिमाग के नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया टोटका करने के लिए नारियल सड़क पर फेंक रहे हैं और उनके सबके मुखिया राहुल गांधी मुस्लिम बुद्धिजीवियों के सामने जाकर गिड़गिड़ा रहे हैं कि कांग्रेस मुसलमानों की पार्टी है इसलिए आप हमें वोट दीजिए।

दिल की बात मुंह पर आ ही जाती है। राहुल गांधी का यह कथन बिल्कुल भी गलत नहीं है। पिछले दशकों से कांग्रेस मुस्लिमों की ही राजनीति करती आई है। मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए कांग्रेस ने इस देश की संसद में अपने विशाल बहुमत का फायदा उठाते हुए एक बेबस और निर्दोष महिला शाहबानो के खिलाफ कानून बनवा दिया था। उस समय कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ जाकर कार्यपालिका की शक्तियों का घिनौना दुरुपयोग किया। आज वही कांग्रेस तीन तलाक जैसे मुद्दों पर मुसलमानों को खुश करने के लिए तीन तलाक विधेयक पर टालमटोल  कर रही है। बात तीन तलाक की हो रही है लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को महिला आरक्षण याद आ रहा है। महिला आरक्षण जरूरी है, उस पर विधेयक आना चाहिए। लेकिन राहुल गांधी से यह पूछा जाना चाहिए कि जब महिलाएं चैके-चूल्हे तक सीमित रहेंगी। तीन तलाक की चक्की में पिसती रहेंगी और हलाला के नाम पर दुष्कर्म की शिकार होती रहेंगी तब उनके बीच से नेतृत्व कैसे उभरेगा? और जब नेतृत्व ही नहीं उभर पाएगा तो राजनीतिक दलों के पास चुनाव लड़ने के लिए महिला नेत्रियों कहां से आएंगी। जब तक समाज की जकड़न और बेड़ियों से महिलाएँ मुक्त नहीं होंगी तब तक उन्हें आरक्षण देकर संसद में भेजने का अथवा महिला सशक्तिकरण करने का मकसद पूरा नहीं हो सकेगा।

लेकिन महिला सशक्तिकरण तो दूर की बात है आज तो कांग्रेस तुष्टीकरण के लिए महिलाओं के पैरों में बेड़ियां डालने के लिए हर सीमा तक जाने को तैयार है। अच्छा होता यदि राहुल गांधी मुस्लिम बुद्धिजीवियों के साथ उस बैठक में कहते कि आप अपना कठमुल्लापन छोड़िए और तीन तलाक जैसे मुद्दों पर इस देश की संसद और इस देश की सरकार का समर्थन कीजिए। अच्छा होता यदि राहुल गांधी उन बुद्धिजीवियों से यह कहते कि समाज को जिस चारदीवारी में और जिस अंधेरे में धकेलने की कोशिश उन्होंने की है उससे बाहर निकलिए। दुनिया जहान देखने की कोशिश कीजिए। अपने आपको बदलिए और तेजी से बढ़ते भारत के साथ कदमताल करते हुए चलिए। लेकिन यह क्या राहुल गांधी ने तो अपना असली चेहरा दिखा दिया? यह कह कर कि कांग्रेस मुस्लिमों की पार्टी है, उन्होंने अपने पूर्वजों के ऊपर मुस्लिमों की सरपरस्ती के आरोपों की एक तरह से पुष्टि कर दी। अकेले राहुल गांधी नहीं हंै इस देश को 10 साल तक सोनिया गांधी की चरण पादुकाएं रखकर जैसे-तैसे चलाने वाले मनमोहन सिंह भी कह चुके हैं कि देश के संसाधनों पर पहला हक मुस्लिमों का है।

सत्ता के राजपथ पर कांग्रेस के लिए मार्ग अवरुद्ध हो चुका है। देश के प्रायः सभी राज्यों से वह बेदखल हो चुकी है। संसद में 44 की संख्या तक सिमट गई है। संख्या इतनी कम है कि देश की संसद की स्पीकर उन्हें बोलने के लिए ही 33 मिनट देती हैं। यह शर्मनाक हालात हैं और इन शर्मनाक हालातों में दिशाहीन, आधारहीन और मुद्दा विहीन हो चुकी कांग्रेस फिर वही कुंजे कफ़स, फिर वही सैयाद का घर की तर्ज पर मुसलमानों में अपनी पनाह तलाश रही है। वह मुसलमानों को धर्मनिरपेक्ष और देश परस्त बनाने की बजाए उन्हें उसी स्थिति में रखना चाहती हैं जिस स्थिति में 70 वर्षों से मुसलमानों को सुनियोजित तरीके से रखा गया है।

यदि कांग्रेस मुस्लिमों की पार्टी है तो फिर आज मुस्लिमों की स्थिति इतनी बेकार क्यों है। हिंदुओं को तो छोड़ दिया जाए, क्योंकि उनकी रहनुमाई करने की जहमत कांग्रेस ने कभी उठाई नहीं, लेकिन मुस्लिमों के सवाल पर कांग्रेस क्या जवाब दे सकती है। क्यों सच्चर कमेटी की रिपोर्ट में मुसलमानों की स्थिति को दलित से भी बदतर बताया गया है? क्यों मुसलमानों के बीच अशिक्षा, बेरोजगारी और भुखमरी सबसे ज्यादा है? मुसलमान आज भी तालीमी रोशनी से दूर जहालत के अंधेरों में रहने को विवश क्यों हैं? क्यों सोशल मीडिया पर मुसलमानों को पंचर बनाने वाला कहा जाता है? मुस्लिमों को इन हालातों में रखने का दोषी कौन है-वही पार्टी जिस के मुखिया ने छाती ठोक कर कहा है

कि उनकी पार्टी मुसलमानों की पार्टी है। लेकिन आज राहुल गांधी को स्पष्ट करना होगा, यदि वे मुस्लिमपरस्ती कर रहे हैं तो फिर उन्हें धर्मनिरपेक्षता का लबादा ओढ़ने की जरूरत क्यों है। यदि वह मुस्लिमों की रहनुमाई कर रहे हैं तो उनकी पार्टी को हिंदू वोट मांगने का हक क्यों है। यदि उनकी करतूतों ने एक नहीं अनेक बार यह सिद्ध किया है कि वोट के लालच में कांग्रेस किसी भी हद तक गिर सकती है तो उनकी पार्टी को दूसरे वर्गों को छलने और उनका भावनात्मक शोषण करने का हक कैसे दिया जा सकता है। देश की जनता राहुल गांधी से जवाब चाहती है जो जनेऊ उन्होंने धारण की है वह असली है या नकली। देश की जनता के समक्ष जब कांग्रेस अपना मुखौटा लेकर जाएगी तो जनता के सवालों का जवाब कौन देगा? ‘मुस्लिम पार्टी’ कांग्रेस ने इसकी तैयारी कर ली है?

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