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सेवा के नाम पर धंधा करने वाले खुद को मिशनरी कहते हैं

आवरण कथा

सेवा के नाम पर धंधा करने वाले खुद को मिशनरी कहते हैं

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मिशनरी आॅफ चैरिटी का असली चेहरा झारखंड में सामने आने के बाद उन लोगों के मुंह सिल गए हैं जिन्होंने इस तरह की संस्थाओं को मिलने वाले पैसे की न तो कभी निगरानी की और न ही इन संस्थाओं पर रोक लगाने का प्रयास किया। रांची के जिस निर्मल हृदय आश्रम में बच्चों को बेचे जाने के मामले का पर्दाफाश हुआ है उसका नाम ही निर्मल है काम इतना मलिन और घृणित है कि जिसे सुनकर मानवता शर्मसार हो जाती है। जिस संस्थान को सेवा का पर्याय मानते हुए गरीब लोग बाल गृह निर्मल हृदय में प्रसूताओं को प्रसव के लिए छोड़ जाते थे वही संस्थान बच्चों का व्यापार करता था।

यह व्यापार वर्षों से चल रहा था एक अनुमान के अनुसार 280 बच्चे जो इस संस्थान में जन्मे उनका कोई रिकाॅर्ड ही नहीं है। अकेले वर्ष 2016 में मार्च से दिसंबर के बीच 36 बच्चों को जन्म हुआ था इनमें से सिर्फ चार बच्चों को ही सीडब्ल्यूसी को दिखाया गया शेष 32 बच्चे अभी कहां हैं इसका कोई पता नही है। इससे पता चलता है कि किस बड़े पैमाने पर बच्चों की बिक्री और तस्करी की जा रही थी। इस संस्था को विश्वसनीय और सम्मानीय मानते हुए प्रशासन ने भी इस की करतूतों से मुंह मोड़ रखा था। सरकार और प्रशासन को लगता था कि जिस संस्था को मदर टेरेसा जैसी महान हस्ती ने स्थापित किया है वह गलत मार्ग पर चल ही नहीं सकती। लेकिन यह संस्था तो कब की पथभ्रष्ट हो चुकी थी, इसमें सेवा के नाम पर धंधा करने वालों ने जनता और प्रशासन दोनों के साथ विश्वासघात किया है।

परोपकार या बच्चों का व्यापार

रांची में ईस्ट जेल रोड स्थित मिशनरीज आॅफ चैरिटी से संचालित ‘निर्मल हृदय’ से बच्चों के बेचे जाने का खुलासा होने के बाद चाइल्ड वेलवेयर कमेटी और पुलिस अधिकारियों की प्रारंभिक जांच में अब ऐसे-ऐसे तथ्य सामने आ रहे हैं जिसकी वजह से संस्था की गतिविधियों पर शक गहराता जा रहा है। इस संस्था की मदद से जिन बच्चों का जन्म हुआ उसमें से 280 का कोई अता-पता नहीं है। वर्ष 2015 से 2018 के बीच यहां करीब 450 गर्भवती महिलाएं थीं। इनमें से सिर्फ 170 की डिलीवरी रिपोर्ट ही उपलब्ध है। जबकि 280 के बारे में कोई जानकारी नहीं है।

चाइल्ड वेलवेयर कमेटी (सीडब्ल्यूसी) ने मिशनरीज आॅफ चैरिटी की कर्मचारी अनिमा इंदिवार और दो सिस्टर्स कोनसीलिया और मेरिडियन के खिलाफ मामला दर्ज करा दिया है। जिसके बाद पुलिस ने तीनों को गिरफ्तार कर लिया है। पूछताछ में अनिमा और सिस्टर्स ने अपना जुर्म भी कबूल कर लिया है। अनिमा और दोनों सिस्टर्स ने ये स्वीकार किया है कि उन्होंने यहां से करीब आधा दर्जन बच्चों को 50 हजार से 1,50,000 रूपये में बेचा है।

इस संस्था के चैरिटी होम में एक अविवाहित गर्भवती लड़की रह रही थी, रांची के सदर अस्पताल में उसने 1 मई को एक लड़के को जन्म दिया। संस्था की अनिमा इंदवार ने ये बच्चा यूपी के एक दंपत्ति को 1 लाख 20 हजार रुपए को बेच दिया। 30 जून को सीडब्ल्यूसी ने अचानक संस्था का निरीक्षण किया। इस पर अनिमा ने बच्चे को दंपत्ती से वापस ले लिया, बाद में उसने बच्चे को वापस नहीं किया। उस दंपत्ती ने इस बात की शिकायत सीडब्ल्यूसी से कर दी, सीडब्ल्यूसी ने अनिमा से बारे में पूछताछ की तो पूरा मामला सामने आ गया।

अभी तो इस पूरे घोटाले की कुछ ही परतें खुली हैं। जिनसे यह पता लगता है कि बच्चा बेचने का यह गोरखधंधा बहुत पहले से चल रहा था। रिकाॅर्ड में भी हेरा-फेरी की जा रही थी। निर्मल आश्रम के पास अप्रैल 2016 से पहले के दस्तावेज गायब हैं। जिन तीन बच्चों को बेचने के बाद यह कांड उजागर हुआ था उनमें से दो बच्चों को बरामद कर लिया गया है। एक की तलाश जारी है। उधर जिन दो बच्चों की मौत बताई गई है उनकी भी जांच प्रशासन की ओर से की जा रही है क्योंकि प्रशासन को भय है कि कहीं इन बच्चों को भी बेचा तो नहीं गया।

आज नवजात बच्चों की खरीद-फरोख्त के बड़े केंद्र के रुप में बदनाम हो चुका यह आश्रम मानव तस्करी का अड्डा भी बन चुका है। बताया जाता है कि वर्ष 2015 से 2018 के बीच यहां पर करीब 450 गर्भवती महिलाएं प्रसव के लिए आई थी इनमें से सिर्फ 170 की डिलीवरी रिपोर्ट ही उपलब्ध है। 280 के बारे में कोई जानकारी नहीं है। खुफिया विभाग के सूत्रों का कहना है कि चैरिटी की आड़ में यहां वर्षों से नवजातों का सौदा हो रहा है। जनवरी 2016 में निर्मल हृदय रांची में 108 गर्भवती महिलाएं थीं, इनमें से 10 बच्चों का ही जन्म दिखाया गया। 98 के बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई।

क्या हो रहा है इन बच्चों का? क्या इन्हें मानव अंग के तस्करों को बेच दिया गया है? कहानी कुछ और भी कहीं जा रही है। बताया गया है कि इन बच्चों को अवैध तरीके से कोलकाता, केरल, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश में फादर, सिस्टर और नन बनने के लिए भेज दिया गया है, इससे इस पूरे घोटाले में एक अलग ही बात निकल कर सामने आ रही है, जब धर्मांतरण को लेकर सरकार का रुख सख्त हुआ है तो अब नए तरीके निकाले जा रहे हैं, नवजात बच्चों को ही धर्म के ठेकेदार निशाना बना रहे हैं।

बलात्कार में भी चर्च का हाथ?

झारखंड के पत्थलगढ़ी में महिलाओं के साथ बलात्कार में भी चर्च से जुड़े लोगों एवं नक्सलियों पर उंगली उठी थी लेकिन बुद्धिजीवियों के एक वर्ग ने चुप्पी साध ली।

चैरिटी को मिले 900 करोड रुपए से अधिक के हिसाब-किताब में इन लोगों का हिस्सा कितना है? इन लोगों को मौन साधने के लिए कितनी रिश्वत दी गई है? यह भी सीबीआई को जांचना पड़ेगा! पत्थलगढ़ी में जिन महिलाओं के एक सामूहिक बलात्कार हुआ वे एक गैर सरकारी संगठन से जुड़ी हुई थी। पत्थलगढ़ी कभी शांत आदिवासी इलाका हुआ करता था जो अपनी समृद्ध जनजातीय परम्पराओं के लिए विख्यात था। किंतु पहले ब्रिटिश शासन और उसके बाद नक्सल तथा चर्च के प्रभुत्व ने इस इलाके की शांति भंग कर दी। आज यहां स्थिति इतनी खराब है कि सरकारी एजेंसियां और बाहरी लोग याहं जा नहीं सकते। जिन महिलाओं को बलात्कार का शिकार बनाया गया वे आशा किरण कार्यकर्ता थीं जो आदिवासी महिलाओं के बीच स्वास्थ्य जागरूकता का कार्य किया करती थी किंतु उनका यह कार्य चर्च के प्रभुत्व को कम कर सकता था।

दूसरी तरफ नक्सली समूहों को भी यह फूटी आंख नहीं सुहा रहा था। इसलिए सुनियोजित तरीके से 5 महिलाओं से बलात्कार कर उनका मनोबल तोड़ा गया। जब पुलिस बलात्कारियों को गिरफ्तार करने गई तो पुलिस को खिलाफ प्रदर्शन हुए। जनता बलात्कारियों की ढाल बनकर खड़ी हो गई क्योंकि कथित रूप से चर्च और नक्सलियों ने बलात्कारियों के समर्थन में फतवा जारी कर दिया था। रांची का बच्चा व्यापार और पत्थलगढ़ी का सामूहिक बलात्कार, नक्सलवादियों और चर्च का षड़यंत्रा उजागर कर रहा है। कहीं ये एक सिक्के के दो पहलू तो नहीं हैं।

ईसाई मिशनरीज पर अब तक धर्मांतरण के ही आरोप लगते रहे हैं लेकिन अब मानव सेवा का दिखावा कर रही इन संस्थाओं का एक अलग ही चेहरा सामने आया है। पहले तो मिशनरियों ने सारे देश में विशेषकर आदिवासी बेल्ट में धर्मांतरण का अभियान चलाया, जिसे कथित रूप से देश और प्रदेश में सत्तासीन कांग्रेस सरकारों का भी परोक्ष रूप से समर्थन प्राप्त था। इस अभियान का एक नया रूप बच्चों की खरीद-फरोख्त सामने आया है। दिलचस्प यह है कि केंद्र में सत्तासीन नरेंद्र मोदी सरकार को बदनाम करते हुए उसके खिलाफ फतवा जारी करने वाले दिल्ली के आर्च बिशप अनिल काऊटो मिशनरीज द्वारा नवजातों के व्यापार पर खामोश हैं। कैथोलिक बिशप कांफ्रेंस आॅफ इंडिया तो पूरी तरह से खुलकर मिशनरी आॅफ चैरिटी के समर्थन में आ गई है। काॅन्फ्रेंस का कहना है कि ईसाई समुदाय को जानबूझकर निशाना बनाया जा रहा है।

कुछ दिन पहले खूंटी में 5 युवतियों के साथ गैंगरेप के मामले में भी स्थानीय मिशनरी स्कूल के फादर अल्फोंस पर आरोप लगाए गए थे। पुलिस का कहना है कि फादर ने न तो युवतियों को बचाने की कोशिश की और न ही पुलिस को मामले की जानकारी दी।

ज्ञात रहे कि उत्तर प्रदेश के सोनभद्र में एक परिवार को बच्चा बेचने का मामला सामने आने पर रांची की बाल कल्याण समिति ने कोतवाली थाने में मिशनरीज आॅफ चैरिटी, उनके बाल ग्रह निर्मल हृदय की संचालिका सिस्टर कांसीलिया, बच्चे को बेजने वाली संस्था की कर्मचारी अनिमा इंदवार, बच्चे की मां, उसके खरीददार सोनभद्र के अग्रवाल दंपत्ति, सदर अस्पताल की गार्ड मंजू और कुछ अन्य के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की थी (देखें बाॅक्स), अब इस मामले में सीबीआई जांच की भी मांग की जा रही है। इस संस्था को 900 करोड़ रुपए से ज्यादा का दान मिला है। इस धन का उपयोग कहां किया गया इस बारे में न  तो संस्था ने कुछ जानकारी दी है और ना ही सरकार या मीडिया को कोई जानकारी है। सिर्फ कयास लगाए जा रहे हैं। गरीबी, भुखमरी और लाचारी के शिकार लोगों की परिस्थिति का फायदा उठाकर इन मिशनरियों ने पहले तो बड़े पैमाने पर धर्मांतरण किया और अब बच्चों की तस्करी पर भी यह मिशनरियां उतर आए हैं। इनकी करतूतों को उजागर होने में इतना समय इसलिए लगा क्योंकि इससे पहले जो भी घपले-घोटाले होते थे उन्हें कांग्रेस या अन्य सरकारों के सहयोग से दबा दिया जाता था। वह तो गनीमत है कि केंद्र में और झारखंड में भारतीय जनता पार्टी की सरकार सत्तासीन है, अन्यथा बच्चों को बचेने का यह मामला भी दबा दिया जाता। कोशिश तो अभी भी वही हो रही है। सरकार और एजेंसियों पर उन लोगों द्वारा दबाव बनाया जा रहा है जो मिशनरी की करतूतों को प्रश्रय देते रहे है। लेकिन झारखंड के मुख्यमंत्राी आरोपियों को सजा दिलाने के लिए प्रतिबद्ध हैं। उन्होंने मामले की जांच के आदेश दे दिए हैं।

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