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देश के विश्वास के विरूद्ध हास्यास्पद अविश्वास

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देश के विश्वास के विरूद्ध हास्यास्पद अविश्वास

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282 सीटों वाली बहुमत से बनी सरकार के प्रति अविश्वास प्रस्ताव देश के विश्वास के प्रति अविश्वास था। अविश्वसनीय और आश्चर्यजनक! स्वतंत्रा भारत की सर्वाधिक लोकप्रिय सरकार और जननायक के विरूद्ध उन आधारहीन, लक्ष्यहीन, दृष्टिहीन दलों का एकजुट होकर जनता में अपनी पकड़ को पहचानने का प्रयास, हास्यास्पद तो था ही, अपने स्वरुप में बेहूदा और निम्न कोटि का प्रदर्शन भी था। कहने को तो तेलुगू ‘देश’ को ही पूरा देश मानने वाला और कल तक राजग का साथी तथा संसद के बाहर कांग्रेस के विरुद्ध प्रदर्शन करने वाले दल तेलुगूदेशम के राज्य के विभाजन की मार से अशक्त हो गए कंधों पर रखकर बंदूक चलाई थी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने। जो भारतीय तो थी ही नहीं, और राष्ट्रीय अब रही नहीं।

दो चार राज्यों में सिमटी हुई, नेतृत्वविहीन और दिशाहीन कांग्रेस की विडंबना यह रही कि बंदूक चला रहे हाथ नौसिखिया थे और लक्ष्यभेद करने की सामथ्र्य उनमें कभी आई नहीं। वैचारिक रूप से दिवालिया हो गई, बिना श्रम के सब कुछ मिल जाने से, नाकारा हो गई और जंग लगी कांग्रेस ने न तो अविश्वास प्रस्ताव के लिए कोई तैयारी की और न वह गंभीर थी। कभी संसद में घंटों बोलने की आदी, 44 सीटों तक सीमित कांग्रेस को 33 मिनट से ज्यादा बोलने का अवसर नहीं दिया जा सकता था। अध्यक्ष को कृतार्थ करने हेतु कांग्रेस के सभी बोल सकने वाले सांसदों ने, अपना समय भी ‘पप्पू दी ग्रेट’ को समर्पित कर दिया था। जिसने भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को विधिवत धन्यवाद दिया जिन्होंने उन्हें ‘भारतीय’ और हिंदू होने का अर्थ समझाया था! इस पूरे ‘एपिसोड’ में यही एक अच्छी बात हुई। बेवकूफी भरी तो अनेक हुईं। जैसे वक्तव्य देने के बाद अकड़ कर चलते हुए प्रधानमंत्राी जी की सीट तक जाकर उनसे एक दो-तीन बार उठने का आग्रह करना, जैसे वे प्रधानमंत्राी से भी बड़े हो गए हों और उनका कद देश की संसद व कार्यपालिका से भी कहीं ऊँचा हो। जिस समय दूरदर्शन पर उनको प्रधानमंत्राी के पास जाता हुआ दिखाया जा रहा था, उससे एक बारगी लगा कि शायद राहुल गांधी को भारतीय संस्कृति की पहचान हो गई है और बड़ों के प्रति सम्मान प्रदर्शित करने, देश के प्रधानमंत्राी के चरण छूकर आशीर्वाद लेने जा रहे हैं। किंतु सिखाए, पढ़ाए, रटाए इस विवेकहीन और बुद्धिहीन तोते से ऐसी समझ की अपेक्षा करना ही फिजूल था, यह दो मिनट में ही समझ में आ गया। उसके बावजूद भी प्रधानमंत्राी के गले लग कर उनका आलिंगन करने का जेस्चर अच्छा लगता, यदि वह अपनी सीट पर जाकर निहायत बेहूदे ढंग से, ज्योतिरादित्य सिंधिया को आँख ना मारते। हो सकता है इसके पीछे कोई खराब भावना ना रही हो। किंतु देश ने तो पकड़ लिया। संदेश तो चला गया। कांग्रेस बैकफुट पर नजर आई।

यूँ तो बिना तैयारी के वो जो भी बोले वह अर्थहीन, अनेक चुनावी सभाओं में कहा गया, घिसा-पिटा वक्तव्य था। किंतु उसकी रही-सही गंभीरता उनके आँख मारने ने समाप्त कर दी। अपनी नादानी में वह अपना पूरा खेल बिगाड़ बैठे। मुखौटा तो उनके चेहरे पर कभी था नहीं। वह तो सदा से बेनकाब रहे हैं। इसमें आश्चर्य क्या है। डाॅ. राजेंद्र प्रसाद, सरदार वल्लभ भाई पटेल, लाल बहादुर शास्त्राी, नरसिम्हा राव आदि को छोड़कर उनके सभी नेताओं ने अपने परिवार को सदा देश की विधायिका, कार्यपालिका व न्यायपालिका से ऊपर माना है।

किंतु, जो भी लीपापोती करने का प्रयास उन्होंने किया वह भी व्यर्थ सिद्ध हुआ। जीएसटी, नोटबंदी, बेरोजगारी हम आरटीआई लाए आदि सभी मुद्दों पर कोई ठोस तर्क और विचार दूर दृष्टि वे प्रस्तुत नहीं कर पाए। प्रधानमंत्राी ने सहा कटाक्ष किया –

साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय।

सार-सार को गहि रहे थोथा देई उड़ाय

लेकिन सार नहीं निकला। सारहीन वक्तव्य से सार निकलता भी कैसे?

इस हास्यास्पद अविश्वास प्रस्ताव का जो हश्र होना था वही हुआ। बच्चा-बच्चा भी जानता था पटाक्षेप कैसे होगा।

तेलुगूदेशम जैसे दलों को अपनी बात कहनी थी, सो उन्होंने कही। कम से कम उनके सम्मुख उद्देश्य तो था। किंतु कांग्रेस की मंशा क्या थी? क्या विपक्षी दलों की एकजुटता की परीक्षा?

पंचर हो चुके टायर-ट्यूब की साइकिल पर सवार समाजवादी पार्टी, सत्ता के नशे से मदमस्त और अंधे हो गए बौराए हाथी पर सवार बहुजन समाज पार्टी, बुझी हुई लालटेन से अंधेरे में प्रकाश खोजते राष्ट्रीय जनता दल आदि-आदि में क्या संभावनाएं तलाशी जा सकती थीं? प्रधानमंत्राी ने कहा –

न, मांझी न रहबर, न हक में हवाएं।

है कश्ती भी जर्जर ये कैसा सफर है।

कांग्रेस के वैचारिक दिवालियापन का इससे बड़ा सबूत और क्या है? देश को चरागाह बना डालने वाले लालू प्रसाद, निहत्थे देशभक्त कारसेवकों को गोलियों से भूनने वाले मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव, बिना कुछ करे शोषित और पीड़ित, दलित वर्ग की मसीहा बनने का ढोंग रचने वाली, ताज काॅरिडोर घोटाले में आकंठ लिप्त मायाचारी मायावती, चिटफंड घोटाले तथा लोकतांत्रिक तरीके से जीतकर आने वाले विरोधी दलों के निर्दोष जनप्रतिनिधियों की नृशंस हत्या करवाने वाली ममताहीन ममता बनर्जी के भरोसे पंजाब की लाठी और कर्नाटक की बैसाखी के सहारे हाथ-पैर टूटी कांग्रेस पुनः सत्ता में आने का सपना देख रही है। एकजुट होकर उस व्यक्ति के विरुद्ध चुनाव संग्राम में उतरना चाहती है, जिसने भारत को वह सब कुछ दिया, जिसका वह अधिकारी था। भारत माता के तार-तार आँचल को सुंदर आकर्षक परिधान से सजाने वाले, सदियों से पीड़ित, शोषित, आतंकित, आक्रांत, अपमानित झुके हुए सिरों को स्वाभिमान से सिर उठाने का अवसर देने वाले, विश्व के दो तिहाई देशों में यात्रा कर उन्हें मित्रा देश बनाने वाले, भारत के विधिवत चुने हुए संवैधानिक मुख्यमंत्राी को अपने देश में आने की मनाही करने वाले देश को पलक पांवड़े बिछा कर स्वागत के लिए विवश करने वाले के विरूद्ध??

उस देशभक्त, जन-जन के हृदय के नायक के विरूद्ध जिसके 4 वर्ष का कार्यकाल बेमिसाल रहा हो, जिसने हर क्षेत्रा में विकास के नए कीर्तिमान रचे हो। देश की रक्षा के लिए हर प्रकार का प्रयास करते हुए भारत को सशक्त बनाया हो। जिस प्रधानमंत्राी ने प्रथम बार देश के कोने-कोने में फैले, पसरे हुए कूड़े करकट के ढेरों को साफ करके सुंदर भारत में तब्दील करने में कोई कोर कसर ना रखी हो। सैकड़ों वर्षो से खुले में शौच जाने की प्रथा को बंद करके और करोड़ों शौचालयों के निर्माण से भारतीय स्त्राी की अस्मिता की रक्षा की हो। जिसने हिंदू-मुस्लिम औरतों का भेदभाव ना करते हुए सभी महिलाओं को बराबर मानते हुए, मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक की दुर्दांत और अमानवीय प्रथा से मुक्त कराने का प्रयास करके, समान भारत की सही अर्थों में नींव डाली हो। जिसने आयुष्मान योजना के माध्यम से स्वस्थ भारत की बुनियाद रखी हो। प्रत्येक राज्य में अनेक ‘एम्स’ खोलकर और मेडिकल काॅलेजों में वृद्धि करके, इस दिशा में महती कदम बढ़ाए हो। जिसने नौकरी की ओर निहारते 10 करोड़ युवकों को, ऋण दिलाकर स्वरोजगार की, अपने पैरों पर खड़े होने की प्रेरणा दी हो और स्वावलंबी भारत की दिशा में बढ़ा हो। जिसने चार करोड़ महिलाओं की धुएं से जलती आंखों में उज्ज्वला योजना से उजाला भरा हो। बैंकों के राष्ट्रीयकरण के बावजूद भी बैंक तक जाने से वंचित करोड़ों लोगों को जनधन योजना से लाभान्वित करके, यह गौरव करने का अवसर दिया हो कि गरीब सही आर्थिक समृद्धि में वे भी भागीदार हो सकते हैं।

जिसने पैसे के अभाव में लटकी 99 सिंचाई परियोजनाओं को 80 हज़ार करोड़ रूपए से पूरा करके, सिंचित भारत के स्वप्न को साकार किया हो। फसल बीमा योजना के माध्यम से 5500 करोड़ रुपए से ज्यादा का क्लेम प्रदान करके 13 सौ करोड़ के प्रीमियम के विरुद्ध, 3 गुना ज्यादा लाभ पहुँचा कर, ‘किसान भारत’ को सार्थक किया हो। 41000 करोड़ रुपए का डिजिटल लेन-देन संभव करके ‘डिजिटल भारत’ के स्वप्न को अमली जामा पहनाया हो। विश्व की लगभग हर मान्यता प्राप्त रेटिंग करने वाली एजेंसियों को वैश्विक स्पर्धा सूची में रेटिंग में सुधार करने पर विवश किया हो। नवोन्मेष सूची में 24 अंक का सुधार कर अर्थव्यवस्था को छठे नंबर तक पहुँचाया हो। काले धन को भारत में वापस लाने के सार्थक प्रयास करते हुए कालेधन को पनपने से रोकने के लिए दो लाख फर्जी कंपनियों पर ताले लगाए हो और शेष पर लगाने की तैयारी में हो। साढ़े चार हजार करोड़ से ज्यादा की बेनामी संपत्ति ज़ब्त की हो। किंतु ऐसी अनेक उपलब्धियाँ कांग्रेस को कब दिखती है!

धारा नैव पतन्ति चातक मुखे

मेघस्य किं दोषणम

चातक पक्षी के मुँह में बारिश की बूंद सीधे नहीं गिरती तो इसमें बादल का क्या दोष।

कांग्रेस की दशा उतनी ही दयनीय है जैसे गौरव पूर्वक लहरा कर चलते हुए गजराज की मस्त चाल पर भोंकते हुए श्वान। आकाश में पत्थर फेंक कर सुराख करने के स्थान पर थूकने की कोशिश में थूक उसी पर आ पड़ रहा है। लोकतंत्रा में विपक्ष शक्तिशाली होना चाहिए। किंतु राष्ट्र हित में, क्योंकि देश के मामले में कोई पक्ष और विपक्ष नहीं होता। केवल एक ही पक्ष होता है देश का पक्ष और उसका यहाँ सर्वथा अभाव है। देश हित में यह यदि यह दल एकजुट हो सकें, जैसे आपातकाल में कांग्रेस की तानाशाही प्रवृत्ति, निरंकुशता और स्वेच्छाचारिता के विरुद्ध हुए थे, सभी विरोधी दल एकजुट। किंतु आज जब देश का स्वर्णिम युग चल रहा हो, तब अपने-अपने स्वार्थों में लिप्त उद्देश्यहीन और भटके हुए यह दल देश की जनता को भटका पाएँगे, भरमा सकेंगे, ऐसा नहीं लगता।

देश की जनता को विश्वास है कि जिसके हाथों में भारत माता की रक्षा की बागडोर है, वह स्वाभिमानी भारत, सशक्त भारत, सुदृढ़ भारत, सुंदर भारत, स्वच्छ भारत, सबल भारत, स्वस्थ भारत, सिंचित भारत, स्वावलंबी भारत, आयुष्मान भारत, युवा भारत, समान भारत, जवान भारत, किसान भारत की स्थापना करने में सर्वथा सक्षम और सर्वगुण-संपन्न है। सर्जिकल स्ट्राइक को ‘जुमला स्ट्राइक’ कहने वाले, डोकलाम पर सेना को कटघरे में खड़ा करने वाले, शहीदों की शहादत का मखौल उड़ाने वाले, देश को बरगला नहीं पाएँगे, ऐसा देश को विश्वास है। स्वयं पर विश्वास करने वाले भरपूर विश्वासी लोगों का वे क्या बिगाड़ सकेंगे। इसलिए तेलुगूदेशम को सहानुभूति पूर्वक समझाते हुए, आंध्र के विकास के लिए सरकार सभी कुछ संभव करेगी कह कर आश्वस्त करते हुए, प्रधानमंत्राी ने कांग्रेस को उसकी शैली में जवाब देते हुए धराशाई कर दिया कि विश्वास के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव देश के विश्वास पर अविश्वास करना ही था।

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