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बेटी को बेटी ही रहने दें

परवरिश रिपोतार्ज

बेटी को बेटी ही रहने दें

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हम स्त्राी के स्त्राीत्व और स्त्रिायोचित विशेषताओं को इतना निमन्तर क्यों समझते हैं। बहुधा माता-पिता कहते सुने जाने जाते हैं कि ‘मेरी बेटी तो बेटा है’ क्यांे? उसका बेटी होना पर्याप्त नहीं हैं? क्या उसका स्त्राीत्व उसकी कमजोरी है। चोरी, बलात्कार, हत्या, डकैती से लेकर जघन्यतम अपराधों में लिप्त पुरूषों को श्रेष्ठ बताते हुए उनकी उपमा स्त्रिायों के संदर्भ में दिया जाना, अपनी बेटी को यह कहना कि यह तो लड़का है सुर्वथा अनुचित है। बल्कि इसके विपरीत किसी मेधावी, सभ्य, सुस्ंकृत बेटे को यह कहना कि यह तो मेरी बेटी है ज्यादा औचित्यपूर्ण प्रतीत होता है।
किंतु यहां बात स्त्राी-पुरूषों की श्रेष्ठता की नहीं हो रही। दोनों श्रेष्ठ हैं और दोनों में सर्वश्रेष्ठ होने की क्षमता है। इसलिए बेटी को बेटी ही रहने दें। उसके स्त्रिायोचित गुण और स्त्राीत्व उसकी ताकत है, उसकी कोमलता ही उसकी विशेषता है, उसके प्रकृति प्रदत्त गुण ही उसे समर्थ बनाते हैं।
किंतु फिर भी माता-पिता अपनी बेटियों में ही बेटे तलाशने लगते हैं और उनकी सोच फिर धीरे-धीरे वैसी ही बन जाती है, अत्यधिक लाड-़प्यार और छूट मिलने के कारण बेटियां मनमानी पर उतर आती हैं, बेटों जैसे बर्ताव करने के चक्कर में बिंदासपन उनके अंदर आ जाता है, स्कूल-काॅलेज, नौकरी यहां तक कि शादी के बाद भी उन के अंदर का बिंदासपन, छोटी-छोटी बातों पर लड़ने लग जाना और अपनी बात मनवा कर छोड़ना, उनकी आदत और स्वभाव बन जाता है, स्कूल-काॅलेज में उनकी इस बोल्डनैस को माँ-बाप बहुत खुशी से स्वीकार लेते हैं और उन्हें अच्छा लगता है कि उनकी बेटियां किसी भी स्थिति का सामना करने में सक्षम हैं। लेकिन यही बोल्डनैस उस समय उन्हें भारी पड़ने लगती है जब वे आॅफिस में दूसरे सहयोगियों के साथ समायोजन नहीं कर पातीं, विवाह होने के बाद भी उन्हें लगता है कि ससुराल में या पति के साथ समायोजन करना उन के लिए संभव नहीं है और बात अलगाव तक पहुंच जाती है।


भाई का न होना
ऐसी लड़कियां जिन के भाई नहीं हैं वे जब अपनी सहेलियों के भाइयों को देखती हैं तो उस कमी को भरने के लिए स्वयं लड़कों जैसा व्यवहार करने लगती हैं। ‘तेरा तो कोई भाई ही नहीं है’, यह बात अकसर उन्हें चुभ जाती है और वे लड़कों की नकल करने लगती हैं। कई बार तो ये लड़कियां अपनी सहेलियों को इस तरह संरक्षण देने लगती हैं जैसे कि कोई भाई करता है। हर चीज में ये आगे रहती हैं, फिर चाहे टिकट लेने के लिए लाइन में खड़े होना हो या काॅलेज टीम की कप्तानी करनी हो। लड़कों की ही तरह कपड़े भी पहनने लगती हैं और कई बार तो उनका अंदाज और चाल भी वैसी ही हो जाती है।
साथियों के दबाव की वजह से वे यह जताने में लगी रहती हैं कि वे भी किसी से कम नहीं हैं और अपनी सुरक्षा खुद कर सकती हैं। यह दबाव कई बार इतना अधिक हो जाता है कि वे कुंठित हो जाती हैं, ‘हमारा कोई भाई नहीं है’। जब वे यह बात अपने माता-पिता से कहती हैं तो वे गर्व से सीना फुला कर कहते हैं कि अरे, तो क्या हुआ, तुम को तो हम ने लड़कों की तरह पाला है। तुम क्या किसी लड़के से कम हो, हमारा तो बेटा हो तुम। यह तुलना ही उसके भीतर हीनता का बोध कराती है। उसे लगता है लड़के श्रेष्ठ होते हैं इसीलिए माँ-बाप ने उसकी परवरिश लड़कों की तरह की है। ऐसे में जब लड़की बड़ी होगी तो उस के अंदर लड़कों जैसे हाव-भाव ही नहीं बल्कि उनके जैसी सोच भी आ जाएगी और वह विरोध करने की भावना या चुनौती देने के लिए हमेशा तत्पर रहने लगेगी।
गलत फैसले ले लेती हैं
माता-पिता अकसर बेटी पर बेटे होने का मुलम्मा चढ़ा कर उसे काफी हद तक गुस्सैल बनाने के जिम्मेदार होते हैं। पिता खासकर बेटे की कमी को भरने के लिए अपनी बेटियों को बेटा मान उन की गलतियों को नजर अंदाज करते रहते हैं, इससे वे बिगड़ती जाती हैं और हमेशा उन्हें लगता है कि वे जो कर रही हैं, सही कर रही हैं। भीतर ही भीतर वे एक तरह की कुंठा में भी जीने लगती हैं क्योंकि उन्हें हर समय खुद को साबित करने की होड़ सी लगी रहती है। पिता तो हर बात मान लेता है लेकिन क्या गारंटी कि पति भी हर बात माने या सहकर्मी भी उसे सह लें।
अकसर ये गुस्सैल बेटियां या बिगड़ी बेटियां अपनी जिंदगी के अहम फैसले बिना सोचे समझे या जल्दबाजी में ले बैठती हैं। किसी दूसरे से सलाह लेने में उनका स्वाभिमान आड़े आता है। नतीजा यह होता है कि बाद में न केवल उन्हें पछताना पड़ता है बल्कि अपनों का सहारा भी प्राप्त नहीं होता।
समझौता नहीं कर पातीं
मनमर्जी चलाने वाली बेटियों को बेटा न होने की भरपाई करने के लिए जिस तरह बिगाड़ा जाता है, उस का परिणाम उन बेटियों के साथ-साथ उन के माता-पिता को भी भुगतना पड़ता है। वे इतनी बिगड़ैल और गुस्सैल हो जाती हैं कि किसी भी जगह समझौता करने को तैयार नहीं होतीं, वे चाहे गलत हों या सही, अपनी बात मनवाने का जनून उन पर सवार रहता है।
ऐसी लड़कियों के वैवाहिक जीवन को ले कर कोई गारंटी नहीं दी जा सकती। पति या ससुराल वाले क्यों उन के बिगड़ैल स्वभाव को भुगतें, उनकी बोल्डनैस शादी के बाद सब से ज्यादा दिक्कत करती है।
हर बात में बहस करना चूंकि उन की आदत बन चुकी होती है इसलिए पति से भी उन की खटपट होती रहती है। पिता की दुलारी ये बेटियां कदम कदम पर अपने बिगड़ैल स्वभाव के कारण मात खाती हैं। एक समय ऐसा आता है जब ये अपने ही माता-पिता की सलाह मानने से इनकार कर देती हैं।
माँ-बाप-बेटी को बेटी ही बनी रहने दें। अगर बेटा नहीं है तो भी लड़की को लड़की की ही तरह पालें और जो सीमाएं तय करनी हैं, वे वक्त रहते तय कर दें। बेटों की तरह उन से अपेक्षाएं रखने के बजाय बेटियों जैसी अपेक्षा रखें, ध्यान रहे कि आज बेटियां भी किसी से कम नहीं हैं, वे बेटी हो कर भी माँ-बाप का ख्याल रख सकती हैं। उनका स्त्राीत्व ही उनकी शक्ति है उन्हें शक्तिविहीन न करें।

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