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दलित आंदोलन को हवा किसने दी

सामयिक

दलित आंदोलन को हवा किसने दी

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सुप्रीम कोर्ट ने एक निर्णय दिया कि अनुसूचित जाति और जनजाति अधिनियम के तहत गिरफ्तारी करने से पहले अपराध की जांच भली-भांति कर ली जाए उसके बाद ही गिरफ्तारी की जाए। सुप्रीम कोर्ट ने यह निर्णय इस अधिनियम के तहत देशभर में हो रही झूठी गिरफ्तारियों और झूठे मुकदमों के चलते दिया है। इससे पहले दहेज प्रतिषेध अधिनियम में भी सुप्रीम कोर्ट ऐसी व्यवस्था दे चुका है।
देखा जाए तो यह दोनों कानून ऐसे हैं जो हमारे समाज के सबसे उपेक्षित और पीड़ित वर्ग दलित एवं स्त्राी को ताकत प्रदान करते हैं। यह निर्विवाद रुप से सत्य है कि इस देश में दलित होना एक अभिशाप है। दलित होने के साथ ही जो अपमान, पीड़ा और कई बार यातनाएं सहनी पड़ती हैं उनका वर्णन शब्दों में नहीं किया जा सकता आजादी के 70 वर्ष बाद भी दलित को जिस नजर से हमारा समाज देखता है वैसा दुनिया के किसी अन्य समाज में देखने नहीं आता। आज भी देश के बहुत से हिस्सों में दलितों को पशुओं से बदतर समझा जाता है, उनका तिरस्कार किया जाता है, उनकी परछाई तक से बचने का प्रयास होता है। दलित दूल्हों को घोड़ी पर नहीं बैठने दिया जाता, उनकी बहन-बेटियों से बलात्कार होता है। समानता तो दूर की बात है उन्हें तो बुनियादी हक भी प्राप्त नहीं है। लेकिन दलितों के प्रति यह दुरावस्था देश के कुछ हिस्सों तक सीमित है और इसका दायरा भी लगातार सिमट रहा है। शहरीकरण के कारण दलित और सवर्ण के बीच का अंतर अब सिमटने लगा है।


किंतु फिर भी जब तक देश में एक भी दलित पीड़ित है, कानून की आवश्यकता तो है। इसीलिए जब सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति संबंधी अधिनियम की धार भोथरी करने का प्रयास किया तो केंद्र में सत्तासीन नरेंद्र मोदी की सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर करते हुए फैसले पर एक बार फिर से विचार करने का कहा। सरकार के हाथ में जो कुछ था और सरकार जितना कर सकती थी उतना सरकार ने तुरंत किया। प्रधानमंत्राी ने बार-बार कहा कि दलितों को उनके अधिकार और उनकी शक्ति से वंचित नहीं किया जाएगा। लेकिन फिर भी राजनीतिक आग पर रोटियां सेकने में माहिर कांग्रेस और संपूर्ण विपक्ष ने सारे देश में कुछ इस तरह का माहौल बनाया, मानो केंद्र में सत्तासीन सरकार दलित अधिनियम खत्म करने की कोशिश कर रही है। दुष्प्रचार इस सीमा तक किया गया कि दलितों को लगने लगा सरकार उन्हें मिला आरक्षण भी खत्म करने वाली है। जबकि आरक्षण के विषय में तो कोर्ट ने कोई निर्णय दिया भी नहीं था। न ही आरक्षण का मामला इस पूरे प्रसंग से कहीं जुड़ा था। लेकिन नरेंद्र मोदी सरकार की लोकप्रियता से भयभीत विपक्षी पार्टियों ने प्रोपेगंडा किया, जिससे दलितों में आरक्षण को लेकर भी भ्रम फैल गया।
जहां तक आरक्षण का प्रश्न है प्रधानमंत्राी स्वयं कह चुके हैं कि उनके जीते जी कोई भी आरक्षण खत्म नहीं कर सकता। केंद्र के अनेक मंत्राी और भाजपा शासित राज्यों के प्रायः सभी मंत्राी यह बार-बार दोहरा चुके हैं कि सरकार आरक्षण में किसी तरह का बदलाव नहीं करना चाहती। किंतु इसके बाद भी सारा देश दलित आंदोलन की आग में झुलस गया। लगभग 10-15 लोगों की दुखद मृत्यु हो गई। अरबों की संपत्ति नष्ट कर दी गई। बहुत से लोग घायल भी हुए और यह सब कुछ किया गया गलत अफवाहें फैला कर। सरकार की नीति की गलत व्याख्या करते हुए और सरकार की नीयत को कटघरे में खड़ा करते हुए।


देखा जाए तो दलित आंदोलन राजनीतिक आंदोलन ज्यादा नजर आ रहा था। यह दलितों का स्वस्फूर्त आंदोलन नहीं था बल्कि इसे सुनियोजित तरीके से भड़काया गया था। दलितों का प्रकरण और सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका अभी विचाराधीन है। सुप्रीम कोर्ट ने उस पर कोई निर्णय नहीं सुनाया है। जिन लोगों ने इस आंदोलन को हवा दी उन्हें कम से कम सुप्रीम कोर्ट के निर्णय तक तो इंतजार करना ही था। लेकिन इतना लंबा इंतजार करने से चुनावी माहौल बनाने में सहायता कैसे मिलती। खासकर कर्नाटक के चुनाव से पहले तमाम राजनीतिक दलों को यह करना जरूरी लगा। इसलिए जानबूझकर उस आंदोलन की आग में घी डालने का काम किया गया। मीडिया की भूमिका भी रचनात्मक नहीं थी। अफवाह फैलाने में मीडिया ने भी भरपूर सहयोग दिया। भ्रम इतना अधिक पैदा किया गया कि कई जगह आंदोलनकारी यह कहते नजर आए कि वह आरक्षण के समर्थन में आंदोलन कर रहे हैं। क्योंकि सरकार आरक्षण खत्म करने वाली है।
इस तरह झूठ को प्रचारित करके सारे देश को अव्यवस्थित करने की साजिश की गई। लेकिन सरकार ने प्रभावी तरीके से इस आंदोलन को नियंत्रित किया। अफवाहों को फैलने से रोका। लोगों को सच और झूठ का ज्ञान कराया। पर इससे एक सवाल तो पैदा होता ही है कि क्या अब राजनीति में झूठ फैला कर, लोगों को बरगला कर सरकारों को अस्थिर किया जाएगा। कांग्रेस और विपक्ष किसी भी तरह सत्ता में आना चाहते हैं, लेकिन सत्ता पाने के लिए जो हथकंडे अपनाए जा रहे हैं वह अब खतरनाक होने लगे हैं। जिस तरह की राजनीति की जा रही है वह निकृष्ट से निकृष्टतम होती जा रही है। हर तरह के दांव-पेंच उन राजनीतिक दलों द्वारा चले जा रहे हैं जो सत्ता से दूर हैं और लगातार सिमट रहे हैं।
देश में भारतीय जनता पार्टी की लोकप्रियता का लगातार बढ़ना कुछ राजनीतिक दलों के लिए अस्तित्व का संकट बन चुका है। इसलिए वे घटिया राजनीति पर उतर आए हैं। दलित आंदोलन इस देश में आवश्यक है, दलितों को उनका हक अवश्य मिलना चाहिए। लेकिन दलित संगठनों को यह समझना होगा कि वह राजनीतिक दलों का मोहरा ना बनें। जिन राजनीतिक दलों के हाथ में इस देश की सत्ता छह दशक तक रही है वह दलितों का उत्थान करने में असफल रहे। दलितों का राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक सशक्तिकरण एक सपना ही बनकर रह गया। लेकिन फिलहाल केंद्र में जो सरकार सत्तासीन है उसमें सर्वशक्तिमान व्यक्ति इस देश के प्रधानमंत्री स्वयं पिछड़े समुदाय से हैं। इस देश का राष्ट्रपति एक दलित है। अनेक राज्यों में पिछड़े अथवा दलितों को मुख्यमंत्रियों से लेकर अनेक महत्वपूर्ण पद सौपे गए हैं। केंद्रीय मंत्रिमंडल में भी उचित अनुपात में दलित मंत्राी हैं। लेकिन उसके बाद भी सरकार पर दलित विरोधी होने का आरोप लगाना राजनीतिक षड्यंत्रा प्रतीत होता है। जहां तक सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का प्रश्न है सरकार को चाहिए कि वह शीघ्र ही कोर्ट से इस विषय में उचित फैसला सुनाने का आग्रह करे। कोर्ट का फैसला मनमाफिक नहीं आता है तो फिर सरकार को कोई कदम उठाना चाहिए, यदि एक बेबस, लाचार और वृद्ध महिला शाहबानो के खिलाफ इस देश की कांग्रेस बहुल संसद मुसलमानों के दबाव में एक काला कानून बना सकती है, तो इस देश के दलित भाइयों को उनका हक देने के लिए, उनकी पीड़ा का समाधान करने के लिए, अध्यादेश लाकर सुप्रीम कोर्ट का निर्णय क्यों नहीं बदला जा सकता? यदि यह आवश्यक है तो अवश्य ही किया जाना चाहिए।

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